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बहरे हज़ज़ सालिम मुसम्मन
1222 1222 1222 1222
सुनाऊँ किस तरह किस्से बता दे खाकसारों के
चली ऐसी हवा की झर गये पत्ते चिनारों के

हुईं क्या हैं खतायें आसमां से चाँद ने पूँछा
कि सारी रात क्यों बहते रहे आँसू सितारों के

तुम्हारे साथ लौटी है दरो दीवार पर रौनक
तड़फते रह गये हैं नीव के पत्थर मिनारों के

चमन के सुर्खरू मंज़र घुली खुशबू फिजाओं में
ये क्या दस्तूर है की देखना अब गम बहारों के

वहीँ खुशियाँ वहीँ पे गम अज़ब आलम विदाई का
शिकन उभरी नजर आते हैं दर्दो गम कहारों के

मिलन की आस दिल में ले चली इक नाव अलबेली
उठी ऐसी लहर की ढह गये अरमां किनारों के

न रखना उल्फतें उनसे न होंठों पे गिला रखना
बड़े कमज़र्फ होते हैं सहारे गम निसारों के
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 23, 2017 at 1:54pm
रचना पटल पे आपकी उपस्थिति स्वागतयोग्य है आदरणीय रवि शुक्ला जी..'शिकन' स्त्रीलिंग है आदरणीय इसलिए 'शिकन उभरी'..'नजर आते हैं' यहाँ 'दर्दो गम' के लिए है..आगे आपकी सलाह महत्पूर्ण होगी..
Comment by Ravi Shukla on January 23, 2017 at 1:09pm

आदरणीय ब्रजेश कुमार जी बढि़या गजल कही है आपने बधाई इसके लिये । पाचवे शेर केे सानी मिसरा में हमें कुछ अटकाव लग रहा है शिकन स्‍त्रील्रिंग है  और शिकन उभरी नजर आते है । दे‍खियेगा । सादर   

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 22, 2017 at 10:10pm
समझ गया आदरणीय हर्फ़ ए इज़ाफत शब्द का मूल वज्न 1 ही होगा..इस हिसाब से मतले का उला मिसरा वहर से बाहर हुआ..आपकी सह्रदयता को नमन करता हूँ...प्रणाम
Comment by Samar kabeer on January 22, 2017 at 8:58pm
हिन्दी और अरबी भाषा के शब्दों में इज़ाफ़त का इस्तेमाल नहीं किया जाता अज़ीज़म,"वफ़ा"शब्द अरबी भाषा का है इसलिये इसमें इज़ाफ़त नहीं लगाई जा सकती,इस लिये ये सही तरकीब नहीं है,उम्मीद है बात स्पष्ट हुई होगी ?
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 22, 2017 at 3:11pm
आदरणीय समर कबीर जी आपके रचना पटल पे उपस्थिति और सारगर्भित टिप्पड़ी से हम जैसे नवागन्तुक काफी कुछ सीखते हैं..आपके बताये अनुसार सुधार करता हूँ साथ ही स्वयं की ज्ञान वृद्धि के लिए आपसे अनुरोध है की 'वफ़ा ए खाकसारों'सही नहीं है थोडा विस्तार में समझा दें..सादर नमन
Comment by Samar kabeer on January 22, 2017 at 1:45pm
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,उमा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के ऊला मिसरे में 'वफ़ा-ए-ख़ाकसरों'की तरकीब सही नहीं है,मिसरा यूँ कह सकते हैं:-
'सुनाऊँ किस तरह क़िस्से बता दे ख़ाकसारों के'
तीसरे शैर के ऊला में 'पे'के स्थान पर 'की'शब्द उचित होगा ।

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