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कविता..मेरे मुस्कुराने का कारण हो तुम

मेरे मुस्कुराने का कार हो तुम
तन्हाई में गुनगुनाने का कार हो
तपती दोपहर में बरसते सावन में
भीड़ में और दूर तलक
वीरान उदास राहों में
कभी फूलों भरी और
कभी छितराए हुए काँटों में
बेपरवाह चलते जाने का कार हो
जब कभी तन्हाई मुझे सताती है
दिल को झकझोरती है और
आत्मा को जलाती है
लेकिन वो भूल जाती है
उसके साथ-साथ तुम्हारी याद
हर लम्हा मुझे सहलाती है
और अहसास ये होता
तुम मेरे साथ हो
जीवन के हर सफ़र में
ऊँची-नीची हर डगर में
मेरे ख्यालात हो
निराशाओं के सूने शज़र में
एक जज्बात हो जो हर क्षण मुझे
बिना थके बिना रुके
चलने को कहता है
और साथ रहता है मेरा साया बनके
अक्सर ऐसा मक़ाम भी आता है
जब ठहर जाने को जी चाहता है
थक जाते है कदम
टूट के बिखर जाने को जी चाहता है
उस पल हाथ मेरा थाम कर
तुम क्षितिज़ को निकलती हो
मैं मंत्रमुग्ध सा देखता हूँ तुम्हें
एकटक-अपलक
और बसा लेना चाहता हूँ
अपनी आँखों में सदा के लिए
काश वक़्त ठहर जाये
ये लम्हा ना बिखर जाये
तुम्हारे हाथों में मेरा हाथ है
जीवन यूँ ही गुजर जाये...

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 731

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 17, 2017 at 9:49pm
आदरणीय गिरिराज जी आपके सुन्दर शब्द हमेशा ही नई ऊर्जा का संचार करते हैं..आपका हार्दिक अभिनन्दन वंदन..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 17, 2017 at 9:45pm
आदरणीय मिथिलेश जी रचना की सार्थक समीक्षा और आपके उत्साहबर्धक शब्दों के लिए हार्दिक आभार..

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 17, 2017 at 9:22pm

आदरणीय बृजेश ब्रज भाई ,  प्रेम  की अच्छी अभिव्यक्ति  हुई है  , हार्दिक बधाई आपको ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 17, 2017 at 12:12pm

आदरणीय बृजेश जी, बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 16, 2017 at 4:48pm
रचना पटल पे आपके अमूल्य समय के लिए हार्दिक अभिनन्दन वंदन आदरणीय समर कबीर जी..
Comment by Samar kabeer on January 16, 2017 at 4:17pm
जनाब बृजेश कुमार'ब्रज'साहिब आदाब,बढ़िया कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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