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हकीकत हूँ परेशां हूँ (मुसल्सल ग़ज़ल)

हकीकत हूँ परेशां हूँ कभी हारा कहाँ हूँ मैं।
हवा हूँ तरबतर खुश्बू चमन तेरे रवाँ हूँ मैं। 1
--------
खिले जो भी गुले गुलजार हर इक ओर देखो तो,
हसीं मौसम चटकता रंग सब का बागवां हूँ मैं। 2
----
अजानो में भजन में एक ही अक्स है मेरा,
दुआ हूँ मैं दया हूँ मैं सभी से आशना हूँ मैं। 3
----
गमों की बात ही क्या हाथ जो दो हाथ में मेरे,
चले आओ सितारों में चमकता कहकशां हूँ मैं। 4
----
अदालत से बचोगे तुम जहां भर के निगाहों से,
छुपाकर जो किये हो जुर्म उसका राजदां हूँ मैं। 5
-----
पसारो पाँख को अपने उड़ो जितना भी दिल चाहे,
नहीं है ओर कोई छोर जिसका आसमाँ हूँ मैं। 6
-----
करो क्यों भेद मुझसे धर्म के नाम पर तुम सब,
कुरानों और ग्रंथो में बराबर ही बयां हूँ मैं। 7
-----
शिवाला या इबादतगाह में मुझको न बाँधो तुम,
कहो मुझको खुदा ईश्वर सभी का रहनुमां हूँ मैं। 8
-----------
मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

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Comment

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 21, 2017 at 2:29pm
जनाब मोहम्मद आरिफ साहब, आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी आपका शुक्रगुजार हूं।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 21, 2017 at 2:27pm
श्रधेय समर कबीर जी,मिथलेश वामनकर जी, आदरणीय गिरिराज भाई साहब,रचना पर आप सबके स्नेहिल प्रतिक्रिया से अभिभूत हूँ इस स्नेह के लिए नमन सह अशेष आभार है।
Comment by narendrasinh chauhan on January 17, 2017 at 2:20pm

सुन्दर  रचना 

Comment by Samar kabeer on January 16, 2017 at 9:04pm
जनाब सुनील प्रसाद जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
जनाब गिरिराज भाई के मश्विरे माक़ूल हैं,कुछ बातें में साझा करता हूँ ।
मतले का ऊला मिसरा यूँ कीजिये;-
'हक़ीक़त है परेशां हूँ,अभी हारा कहाँ हूँ मैं'
तीसरे शैर में क़ाफ़िया दोष तो है ही,ऊला मिसरा भी लय में नहीं है,इस शैर को यूँ किया जा सकता है:-
'अजानों में भजन में एक ही तो अक्स है मेरा
दुआ भी हूँ,दया भी हूँ,सभी पे मह्ररबां हूँ मैं '
चौथे शैर में 'कहकशाँ'स्त्रीलिंग है, इसलिये "चमकती कहकशाँ"करना उचित होगा ।
पांचवें शैर में 'निगाहों'भी स्त्रीलिंग है, इसलिये "की निगाहों"करना उचित होगा ।
सातवें शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं है,और सानी मिसरे में'क़ुरानो'शब्द बहुवचन है, और "कुरआन"का बहुवचन नहीं होता वो एक ही है, इस शैर की इस्लाह में वक़्त लग जायेगा ।
आख़री शैर में भी क़ाफ़िया दोष है,सही शब्द है "रहनुमा"
बाक़ी शुभ शुभ

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 16, 2017 at 8:37pm

आदरणीय सुनील जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई. ग़ज़ल के अशआर पर तार्किकता एवं बह्र के हवाले से कुछ बातें साझा कर रहा हूँ-

हकीकत है परेशां हूँ मगर हारा कहाँ हूँ मैं।.................. कथ्य की तार्किकता पर विचार कीजियेगा
हवा हूँ तरबतर खुश्बू चमन तेरे रवाँ हूँ मैं। 

अजानो में, भजन में एक ही तो अक्स है मेरा,...................... तो, बह्र निभाने के लिए 
दुआ हूँ मैं दया हूँ मैं सभी से आशना हूँ मैं। 3
----
गमों की बात ही क्या हाथ जो दो हाथ में मेरे,... यहाँ 'दो हाथ' का निहितार्थ 'दोनों हाथ' या' हाथ देने' के अर्थों का भ्रम पैदा कर रहा है. 
चले आओ सितारों में चमकता कहकशां हूँ मैं। 4
----
अदालत से बचोगे तुम जहां भर के निगाहों से,
छुपाकर जो किये हो जुर्म उसका राजदां हूँ मैं। 5............... छुपाकर जो किये हैं जुर्म ... कहना ज्यादा सही नहीं होगा?
-----
पसारो पाँख को अपने उड़ो जितना भी दिल चाहे,............ पसारो पंख अपने फिर उड़ो जितना भी दिल चाहे
नहीं है ओर कोई छोर जिसका आसमाँ हूँ मैं। 6
-----
करो क्यों भेद मुझसे धर्म के नाम पर तुम सब,.......... करो मत भेद मुझमें यूं धरम के नाम पर तुम सब ---- मिसरा बेबह्र हुआ इसलिए
कुरानों और ग्रंथो में बराबर ही बयां हूँ मैं। 7
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2017 at 8:05pm

आदरनीय सुनील भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।
आ. दो एक बात खना चाहता हूँ --
1 - हकीकत हूँ परेशां हूँ कभी हारा कहाँ हूँ मैं   -- इस मिसरे मे  ' कभी ' को  अभी कर के देखियेगा
2-  आशना , काफिया सही  नही है --  बयाँ कहाँ .... आदि के साथ
3-  करो क्यों भेद मुझसे धर्म के नाम पर तुम सब,  -- इस मिसरे की लय जाँच लीजियेगा - बे बहर लग रहा है

Comment by Mohammed Arif on January 16, 2017 at 4:47pm
आदरणीय सुनील प्रसादजी, आदाब ! साम्प्रदायिक सद्भभावना को बढ़ावा देती ग़ज़ल के लिए बधाई ।
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 16, 2017 at 4:05pm
जी ,आदरणीय ब्रजेश ब्रज जी आपने सही कहा मूल रचना में इसे सुधार लिया जाएगा। एक गुरु काम है।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 15, 2017 at 5:24pm
वाह बहुतखूब आदरणीय...तीसरे शे'र के उला मिसरे को देखिये जरा..मापनी से बाहर है क्या??

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