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एक जलज - वीराने में
चहकता हुआ
महकता हुआ
दाग नहीं लगने दिया कभी
आब के छींटे का भी
चक्रवातों में घिरा रहा था
जिन्दगी भर।

लौट चले वो झख मारकर
धक्के खाकर थक हारकर
नाखून घिसाकर दाँत किटकिटाकर
आँधी तूफान भँवर
और
चक्रवात भी।

फिर भी लहलहाता रहा
वह वारिज
कोशिश में
अंबर को नापने की।

चुभने लगी
खुद की ही कलियाँ
शूल बनकर
सताने लगे स्व-सद्कर्म
भूल बनकर।

समझ में आया
क्या खोया?
क्या पाया?
जीवन में
फूल बनकर।

मजबूर निढाल चोटिल
वक्त ने सिखा दिया
वक्त के साथ
ढल जाना।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 27, 2016 at 12:14pm
श्रद्धेय समर कबीर साहब आदाब।रचना प्रशंसा के लिए सादर आभार।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 27, 2016 at 12:11pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण जी सादर आभार।
Comment by Samar kabeer on December 25, 2016 at 8:40pm
जनाब सुरेश कुमार 'कल्याण'जी आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 8:21pm

आ० एक अच्छी कोशिश हुयी है .  .

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 25, 2016 at 2:10pm
आदरणीय महेन्द्र कुमार जी सादर आभार।
Comment by Mahendra Kumar on December 25, 2016 at 11:25am
आदरणीय सुरेश जी, बहुत ही अच्छी वैचारिक कविता लिखी है आपने। मेरे तरफ से ढेरों बधाई प्रेषित है। सादर।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 25, 2016 at 9:19am
आदरणिया प्रतिभा पांडेय जी रचना पर अपने सुंदर उद्गार प्रकट करने एवं प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार । सादर।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 25, 2016 at 9:17am
श्रद्धेय मिथिलेश वामनकर जी रचना प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार।सादर।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 25, 2016 at 9:03am
आदरणीय आशीष यादव जी हार्दिक आभार।सादर।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 25, 2016 at 9:02am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी रचना अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार।सादर।

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