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( बेवजह भौंकनेवालों को संबोधित)
रमल मुरब्बा सालिम
2122 2122
***
देख ढ़ेर बवाल मत कर
दोहरी अब चाल मत कर।1

रंग देख हँसे जमाना,
गिरगिटों-सा हाल मत कर।2

हैं सियारों-सी अदाएँ,
शेर वाली खाल मत कर।3

जो लड़ाई लड़ रहा उस
शस्त्र को वाचाल मत कर।4

कर रहा कुछ खुद नहीं तू,
भौंक कर अब ढ़ाल मत कर।5

बुझ गयीं कितनी मशालें,
और अब पामाल मत कर।6

श्वान भी सीमा बचाते,
भौंक,पर बेताल मत कर।7

सींचना संभव नहीं तो,
पेड़ को बेडाल मत कर।8

पूछ ले खुद से कभी तू,
और आज सवाल मत कर।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on October 10, 2016 at 7:47pm
आभार आपका आ. राजेश जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 10, 2016 at 5:46pm

देख ढ़ेर  --इसको २१२२ में आपने कैसे बांधा आद० मनन जी देख ढेर की मात्राएँ २१२१ होंगी और बबाल की १२१ 

२१२२ में २ को ११ करने की छूट नहीं होती 

वैसे भी जो  आपने  लिखी  है  वो  बह्र -रमल मुरब्बा सालिम है 

इस हिसाब से आपके कई मिसरे बेबह्र हो  रहे हैं

आद० समर भाई जी का ध्यान इस और पता नही क्यूँ नही गया | 

जो लड़ाई लड़ रहा उस
शस्त्र को वाचाल मत कर।4---बहुत  खूब  बस इसी तरह हर मिसरे को बांधना है 

Comment by Manan Kumar singh on October 9, 2016 at 5:10am
आदरणीय सुरेश जी, आपका बहुत बहुत आभार।
Comment by Manan Kumar singh on October 9, 2016 at 5:08am
जनाब समर जी हौसला आफजाई के लिए दिली शुक्रिया कुबूल करें,आदाब!
Comment by Manan Kumar singh on October 9, 2016 at 5:07am
आभार आपका आदरणीय सुशील सरना जी।
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 8, 2016 at 7:59pm
आदरणीय मनन कुमार जी मौजूदा स्थिति को दर्शाती सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by Samar kabeer on October 8, 2016 at 5:16pm
जनाब मनन कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
Comment by Sushil Sarna on October 8, 2016 at 12:34pm

श्वान भी सीमा बचाते,
भौंक,पर बेताल मत कर।7

वर्तमान स्थिति के अनुरूप इस बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय मनन जी।

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