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ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )
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शिकवे गिले भुलाकर उल्फत को हम बढ़ाएं ।
मिल जुल के आओ जश्ने आज़ादी हम मनाएं ।

तोड़ें न मंदिरों को मस्जिद नहीं गिराएं ।
माहौल एकता का हम देश में बनायें ।

क़ुर्बानियों से जिनकी आज़ाद हम हुए हैं
हम उनके हक़ में आओ दस्ते दुआ उठायें ।

उल्फत से हम रहेंगे झगड़ा नहीं करेंगे
क़ौमी निशाँ के नीचे आओ क़सम ये खाएं।

गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा
अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।

बस मेरी रहबरों से इतनी सी है गुज़ारिश
मज़हब की आड़ लेकर दंगे नहीं कराएं ।

इंसानियत के नाते हम सब हैं भाई भाई
तस्दीक़ कब है ज़ेबा बाहम लहू बहाएं ।

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 18, 2016 at 7:59pm

मोहतरम जनाब सौरभ साहिब , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया ---


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 18, 2016 at 4:05pm

संदेशपरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय तस्दीक अहमद साहब.

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 18, 2016 at 12:33pm

मोहतरम गोपाल नारायण साहिब , ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2016 at 9:50pm

bahut badhiyaa , saadar .

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 17, 2016 at 8:17pm

मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी ----

Comment by Samar kabeer on August 17, 2016 at 3:43pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,बहुत बढ़िया पैग़ाम दे रही है आपकी ग़ज़ल,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 16, 2016 at 7:50pm

मोहतरम  जनाब  शेख शहज़ाद  उस्मानी साहिब  , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 16, 2016 at 7:49pm

मोहतरम  जनाब गिरिराज   साहिब  , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 16, 2016 at 7:48pm

मोहतरमा  कल्पना  साहिबा  , ग़ज़ल में गहराई से शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी --

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 16, 2016 at 5:47pm
वाह... ऐसा ही तो हो..आमीन..
// गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा
अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।// इस झकझोरते शे'अर के साथ सम्पूर्ण ग़ज़ल के लिए तहे दिल से बहुत बहुत मुबारकबाद मोहतरम जनाब तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब। दुआओं के साथ काश हम यह सब चरितार्थ कर सकें।

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