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जेब में सहमा हुआ इतवार है (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ २१२२ २१२

मजहबों के बीच जो दीवार है

डालती उस नींव को सरकार है

हाथ में जिसके किताबें चाहिए

आज उसके हाथ में हथियार है

जिन्दगी इक बार मिलती है यहाँ

मर रहा इंसान सौ सौ बार है

ख्वाहिशें बच्चों की पूरी क्या करें

जेब में सहमा हुआ इतवार है

पढ़ नहीं सकता यहाँ इक हर्फ़ जो

बेचता सड़कों पे वो अखबार है

राम रहिमन बिक रहे बाजार में

फल रहा बस धर्म का व्यापार है

नारियाँ महफूज़ बोलो हैं कहाँ

आज सड़कों पर लुटे संसार है

गुम कहाँ जाने हुए वो कहकहे

हर कोई दिखता यहाँ गमख्वार है

बादलों की देख के दादा गिरी

आज सावन भी हुआ बेजार है

दुश्मनी केवल यहाँ इंसान में

जानवर को जानवर से प्यार है

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2016 at 5:49pm

आद० सतविंदर भैय्या ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ तहे दिल से आभारी हूँ .

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 13, 2016 at 5:17pm
वाह्ह!हर एक शैर सामयिक और प्रभावी बन पड़ा है।सादर नमन आदरणीया राजेश दीदी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2016 at 2:53pm

आद० अखिलेश जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई  आपकी दाद और परामर्श दोनों का स्वागत है |अंतिम मिसरे को मैं मूल पोस्ट में पहले ही सुधार चुकी हूँ यहाँ पर सोच रही थी एक दो दिन बाद संशोधन कर पुनह अप्रूवल के लिए दूँगी |मिसरा इस तरह चेंज किया था  --

दुश्मनी इंसान की इंसान से  

जानवर का जानवर से प्यार है 

अखबार वाला मिसरा चाइल्ड लेबर को केन्द्रित कर लिखा है |

आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on July 13, 2016 at 1:27pm

आदरणीया राजेशजी

पूरी गजल तीर की तरह मारक है, हार्दिक बधाई। गजल विधासे अनभिज्ञ होते हुए भी कुछ सुझाव .....

पढ़ नहीं सकता यहाँ इक हर्फ़ जो, बेचता सड़कों पे वो अखबार है...जहाँ हजारों लाखों ऊँची  डिग्रीधारी  बहुत  छोटी नौकरी यहां तक पीएचडी भी चपरासी के लिए आवेदन करते हों उस भारत  के लिए ....

ऊँची  डिग्री बी ए एम ए पास जो, बेचता सड़कों पे वो अखबार है ।  [ क्योंकि पूरी गजल में वर्तमान व्यवस्था के प्रति आक्रोश है ]

जानवर पशु ... जानवर पशु से पृथक तो नहीं है....

जानवर पशु पक्षियों में प्यार है....  देख लो पशु पक्षियों में प्यार है [ या ऐसा ही कुछ ]

सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2016 at 10:46am

आद० डॉ० विजय शंकर जी इस होंसलाफ्जाई का तहे दिल से बहुत- बहुत शुक्रिया |  

Comment by Dr. Vijai Shanker on July 12, 2016 at 10:24pm
प्यार की बातें नफरत का व्यापार है।
बहुत खूब , आदरणीय सुश्री राजेश कुमारी , जी सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2016 at 8:22pm

आद० अशोक रक्ताले जी ,आपकी ग़ज़ल पर शिर्कत और होंस्लाफाई का तहे दिल से शुक्रिया मेरा लिखना सार्थ हुआ |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2016 at 8:20pm

प्रिय प्रतिभा जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई इस होंसलाफ्जाई का बेहद शुक्रिया आप का कहना सही है बादलों की दादागिरी हर जगह पंहुच रही है आपका बहुत बहुत आभार .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2016 at 8:18pm

ठीक  है  आद०  समर भाई  जी यही मिसरा रीप्लेस  कर दूँगी सादर आभार |

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 12, 2016 at 7:57pm

दुश्मनी केवल यहाँ इंसान में

जानवर पशु पक्षियों में प्यार है.....सही कहा है.

 आदरणीया राजेशकुमारी जी सादर, आज की परिस्थिति पर बहुत सुंदर गजल कही है. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

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