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ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२ २१२ २१२ २१२

इक सवाल आँखों में ही बसा रह गया

यूँ लगे जैसे इक ख़त खुला रह गया

रेल से वो चली शहर ये छोड़कर

और टेशन पे  मैं बस खड़ा रह गया

दाग गिनवा रहा था जमाने के मैं

सामने मेरे बस आइना रह गया

वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज

देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया

शख्स हर जानता जिंदगी है सफ़र

मंजिलें हर कोई ढूंढता रहा गया

दम निकलते समय भूला मैं रब को भी

इन लबों पर तेरा नाम सा रह गया

हो गए शहर भी स्मार्ट अब देखिये

शहर में सिर्फ मैं बावला रहा गया

धुल गये जह्न से चेहरे गुमनाम जी

शेर तेरा जुबां में घुला रह गया

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Views: 582

Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 28, 2015 at 8:36am
धुल गये जह्न से चेहरे गुमनाम जी
शेर तेरा जुबां में घुला रह गया



वह्ह्ह्ह्ह्!बहुत ख़ूब
Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 27, 2015 at 9:43pm

आदरणीय गुमनाम जी ,,अच्छी ग़ज़ल कभी कभी ऐसे ग़ज़लें मिल जाते हैं जिन्हें गुनगुनाने में बहुत मज़ा आता है .आपकी इस ग़ज़ल को गुनगुनाने में बहुत लुत्फ़ उठाया .इस रचना के लिए तहे दिल बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2015 at 8:59pm

वक़्त सा वैध भी कर ना पाया इलाज

देखिये ज़ख्म तो ये हरा रह गया----------------बढ़िया  पर् वैध  की जगह वैद्य.    सादर. 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on December 24, 2015 at 10:38pm

.

धुल गये जह्न से चेहरे गुमनाम जी

शेर तेरा जुबां में घुला रह गया
...
शातुर्गुरबा प्रतीत हो रहा है ..बाक़ी गुनिजन मार्गदर्शन करें..
ग़ज़ल उम्दा है ..दाद लीजिये 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 24, 2015 at 9:40pm
बहुत सुंदर आदरणीय गुमनाम जी बहुत बहुत बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 24, 2015 at 12:23pm

आदरणीय गुमनाम भाई , गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ।

चौथे शेर मे  --- वैध   को वैद्य कर लीजियेगा ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2015 at 5:05am

आदरणीय गुमनाम जी सुन्‍दर ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाई ...  सादर

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 23, 2015 at 7:09pm

धन्यवाद दोस्तो............... अब कोशिश रहेगी अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करू............

Comment by Ravi Shukla on December 23, 2015 at 12:09pm

आदरणीय गुमनाम जी सुन्‍दर ग़ज़ल के लिये बधाई स्‍वीकार करें

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 23, 2015 at 11:28am

बहुत सुंदर ग़ज़ल्हुई है आ0 गुमनाम भाई जी , ...आजकल कहाँ गुम हो गये हो .

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