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ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न था

 

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना

इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

 

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी

प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

 

डॉ सूर्या बाली 'सूरज'

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 18, 2015 at 11:24pm
बेहद उम्दा ग़ज़ल कही है आदरणीय
Comment by Ashok Kumar Raktale on November 18, 2015 at 7:11pm
क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो
इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था...........वाह ! खूब कहा है. अब तो हम भी कुछ ऐसा ही कह रहे हैं.कोई पता न खबर है. डॉक्टर साहब हो कहाँ ?
बहुत खुबसूरत गजल कही है.बहुत मुबारकबाद कुबुलें.सादर.
Comment by Mahendra Kumar on November 18, 2015 at 11:02am
बेहतरीन!
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 17, 2015 at 11:43am

बड़ी ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है आरणीय सूर्या साहब। दिली दाद कुबूल करें।

Comment by Sushil Sarna on November 16, 2015 at 6:12pm

टुकड़ा टुकड़ा हो गया है ज़िंदगी का आईना
इससे पहले भी मैं टूटा था मगर इतना न था

उसके जाने से बढ़ी 'सूरज' मेरी तिष्नालबी
प्यार के दरिया में प्यासा था मगर इतना न था

वाह आदरणीय सूरज बाली जी वाह .... हर लफ्ज़ खूबसूरत अहसासों से लबरेज़ नज़र आता है ..... हर मिसरा कुछ बयां करता है .... दिलकश अशआर ,दिलकश अंदाज़ .... शे'र दर शे'र दिल से दाद कबूल फरमाएं आदरणीय।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2015 at 4:42pm

दिलसे दाद कुबूल करें आदरणीया सूर्या बालीजी. वाह वाह !

एक अरसे बाद आपको इन पन्नों में देखना रोमांचित कर रहा है !  विश्वास है, आपका ग़ज़लकार अब ज़ल्दी-ज़ल्दी आया करेगा. 

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 16, 2015 at 4:18pm

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था     --  आदरणीय सूर्या बाली जी , इस हासिले ग़ज़ल शे र के लिये और पूरी ग़ज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Ravi Shukla on November 16, 2015 at 2:51pm

आदरणीय डॉ सूर्या बाली 'सूरज' जी बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है बधाई । शायद आपको पहली बार मंच पर पढ रहे है । बहुत अच्‍छा लगा

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था     बहूत खूब बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 15, 2015 at 10:29pm

आदरणीय डॉ सूर्या बाली 'सूरज' जी बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. 

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