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जीवन की आपाधापी में,

जीवन की आपाधापी में,                     

दिन बचपन के भूल गये,                    

परिवर्तित हो गयी हवायें,                       

मौसम भी प्रतिकूल भये।
वो शाम सुहानी,मित्रों के दल,                   

और किनारा नदियों का,                       

कूद, कबड्डी,गुल्ली डंडा,                          

झर झर झरना सदियों का,                     

खेत और खलिहान की रंगत,                      

लदी डाल  में अमियों का,            

मानचित्र बनता है मन में,                        

धूल-धूसरित गलियों का,                    

भौतिकता  के मैराथन में,                       

हम इतने मशगूल भये। जीवन---
बाबू जी की उंगली थामे,                      

ढलती शाम की बेला में,                          

चल पड़ते थे खुशी-खुशी हम,          

अपने गाँव के मेला में,                          

पानी-पूरी,चाट,मुगौरी,                          

और खसता के चटकारे,                          

बाँसुरी,पिपिहरी,शीटी भी,                        

और हवा के गुब्बारे,                  

मेघनाद,रावण के पुतले,                        

लगते थे कितने प्यारे ,                      

जीत राम की होती थी,                         

और हर्षित होते थे सारे,                       

वो कल बदला,वो पल बदला,                      

अब सब विचार निर्मूल भये।जीवन----
खुले गगन में दादी के संग,                  

गर्मी की उन रातों में,                             

उड़ता था मन मतवाला हो ,                      

मीठी-मीठी बातों में,                        

राजा रानी और परियों के,                       

किस्से अब क्यों भूल गये ।  जीवन----
अजय शर्मा "अज्ञात "

मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 29, 2015 at 6:21am

आदरणीय अजय भाई , गाँव मे बिते बचपन की यादें ताज़ा हो गईं , बहुत सुन्दर !! आपको कविता के लिये हार्दिक बधाइयाँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 28, 2015 at 1:53pm

आदरणीय अजय जी इस प्रस्तुति में यादों को बहुत बढ़िया शब्द मिले है. बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 27, 2015 at 9:12pm

गाँव की बीती बाते बीता बचपन ताउम्र याद रहता है उन खूबसूरत यादों को शब्दों का जामा पहनाकर बहुत सुन्दर कविता रची है है आपने अजय जी ,बहुत- बहुत बधाई 

Comment by Ajay Kumar Sharma on October 26, 2015 at 10:01pm

आप समस्त महानुभावों का हृदय से आभार।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 26, 2015 at 8:21pm
सुंदर सटीक शब्दों के साथ यादों की सैर कराने के लिए बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय अजय कुमार शर्मा 'अज्ञात' जी।
Comment by pratibha pande on October 26, 2015 at 7:12pm

अब सब विचार निर्मूल भये।जीवन----
खुले गगन में दादी के संग,                  

गर्मी की उन रातों में,                             

उड़ता था मन मतवाला हो ,                      

मीठी-मीठी बातों में,                        

राजा रानी और परियों के,                       

किस्से अब क्यों भूल गये........सच में इस वातानूकूलित  जनरेशन के लिए तो  गर्मियों में छत पर सोना एक दन्त कथा सा है , धन्यवाद आपका कुछ खुशनुमा यादों को फिर से जीवंत  करने के लिए आदरणीय अजयजी .  

Comment by kanta roy on October 26, 2015 at 5:39pm

बहुत ही मीठी -मीठी यादों से भरी ये रचना हुई है आदरणीय अजय शर्मा "अज्ञात "जी। यादों का सफर ऐसा ही होता है।  बधाई 

Comment by Rahila on October 26, 2015 at 4:09pm
बहुत ही सुन्दर चित्रण आद. अजय शर्मा जी ।गांव की सौंधी खुशबू में रची बसी आपकी इस रचना के लिये बहुत बधाई आपको ।

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