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अकेला-एकान्त

असंग आत्म-विश्वास का

गम्भीर भान

अकेला-एकान्त

कभी करी हुई विलीन हुई बातें

अनबूझा विशाद

संसारी गतिविधियों से 

परिवर्तित प्रवृत्तियों से 

बदले व्यवहार से शब्दों की चोट से

कुछ हुआ अचानक

हमारे बीच का बहता वह सुगम प्रवाह

घनिष्ठ अपनत्व

अमृत-सा सुख

सूख गया

खुशियों का हिस्सा जो लगता था मेरा था

अब मेरा न था

असंवेदनाओं के धरातल पर अकस्मात

काँच-सा फूट गया

खुशियों के टुकड़ों के चूर को बुहारते

विश्लेषण के भी विश्लेषण में तल्लीन

अश्रुपूर्ण है आज अशान्त

अकेला-एकान्त

--------

विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 602

Comment

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Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 14, 2015 at 7:13am

बहुत भावपूर्ण रचना... एकांत भाव को प्रस्तुत करती प्रभावी प्रस्तुति के लिये बधाई ...सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 13, 2015 at 9:49pm
आदरणीय निकोर सर, इस सशक्त प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है।
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 13, 2015 at 8:28pm

आ0 निकोर सर जी, ''विश्लेषण के भी विश्लेषण में तल्लीन''  दुनिया ऐसी ही है,   अतीव सुंदर कविता.  बधाई स्वीकारे. सादर

Comment by Shyam Narain Verma on May 13, 2015 at 1:24pm

अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई 

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 13, 2015 at 10:45am

खुशियों का हिस्सा जो लगता था मेरा था

अब मेरा न था

असंवेदनाओं के धरातल पर अकस्मात

काँच-सा फूट गया

खुशियों के टुकड़ों के चूर को बुहारते

विश्लेषण के भी विश्लेषण में तल्लीन

अश्रुपूर्ण है आज अशान्त

अकेला-एकान्त ----------  एकांत में विगत में हुई बातों पर बरबस ही ध्यान जाता है और व्यक्ति उन्ही में खो जाता है | इसको कागज़ पर उतारने आपकी सशक्त लेखनी को नमन आदरणीय श्री विजय निकोरे जी 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 13, 2015 at 12:12am

बहुत सुंदर लिखा,सर.

खुशियों के टुकड़ों के चूर को बुहारते

विश्लेषण के भी विश्लेषण में तल्लीन

अश्रुपूर्ण है आज अशान्त

अकेला-एकान्त......... अनेकोनेक विश्लेषण के पश्चात, शायद यही सार है.

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 12, 2015 at 8:28pm
हमारे बीच का बहता वह सुगम प्रवाह
घनिष्ठ अपनत्व
अमृत-सा सुख
सूख गया
बहुत खूब, सुन्दर, बधाई, आदरणीय विजय निकोर जी , सादर।
Comment by Samar kabeer on May 12, 2015 at 2:24pm
जनाब विजय निकोरे जी ,आदाब,मैं आपकी कविताऐं सुनता रहता हूँ ,बहुत अच्छा लिखते हैं आप,इस कविता के लिये भी दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

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