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             स्वप्न-भाव

मुझको सपने याद नहीं रहते

दर्द की कोख से जन्मे एक सपने के सिवा

आत्मीय पहचान का गहरापन ओढ़े

बार-बार लौट आता है वह

पलकों के पीछे के अंधेरों से धीरे-धीरे

जीवन के अंगारी तथ्यों की ज्वलन्त

सच्चाई की चिरन्तन खोज में

आदतन अनदीखे आत्मा तक मेरी

तुम्हारी तरह

शायद रह गया हो उसका कुछ अपना यहाँ

या, तुम ही कुछ भूल गई थी क्या

जो रह गया प्राणों में काँटे-सा चुभा

दर्द भरे अकुलाते अनुभव-सा 

मुझमें

लिए दुख की कथाएँ

आशंका की काली छायाएँ

हमेशा के लिए ...

आत्म-मन्थन करती बेचैन भीतरी सोच

खोल देती है अधबने सपने में भी

नव-आविश्कृत

अर्थहीन प्रश्नों के द्वार

 -- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:56pm

//आत्म-मन्थन करती बेचैन भीतरी सोच
खोल देती है अधबने सपने में भी
नव-आविश्कृत
अर्थहीन प्रश्नों के द्वार//

आदरणीय विजय निकोर साहब, यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है, आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी, बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें.

Comment by vijay nikore on June 14, 2015 at 10:12pm

रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, आदरणीय भाई गिरिराज जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 7:58am

आदरणीय विजय भाई ,  अमर विरह प्रेम  की कभी न ख़तम होने वाला इंतिज़ार ।  मार्मिक , सुन्दर वर्णन । हार्दिक बधाई ।

Comment by vijay nikore on June 14, 2015 at 3:54am

आपने इस रचना को मान दिया, आपका हार्दिक आभार, आदरणीया कांता जी।

Comment by kanta roy on June 9, 2015 at 12:39pm
शायद रह गया हो उसका कुछ अपना यहाँ
या, तुम ही कुछ भूल गई थी क्या
जो रह गया प्राणों में काँटे-सा चुभा
दर्द भरे अकुलाते अनुभव-सा 
मुझमें ........ बहुत अपना सा लगा पढकर आपकी यह रचना आदरणीय विजय निकोर जी ...... हार्दिक बधाई स्वीकार करें
Comment by vijay nikore on June 9, 2015 at 10:36am

आदरणीय सौरभ भाई, आपकी इस प्रतिक्रिया से बहुत प्रोत्साहन मिला, लगा कि मैं और भी अच्छा लिखूँ, ओ बी ओ के साथ बढ़ता चलूँ।

हृदयतल से आपका आभार।

Comment by vijay nikore on June 9, 2015 at 10:31am

आदरणीय श्री सुनील जी, रचना को समय देने के लिए और सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on June 9, 2015 at 10:29am

आदरणीय केवल प्रसाद जी, सराहना के लिए हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on May 30, 2015 at 8:28am

//वेदने ! तू भी भली बनी

तुझ मे ही तो मैंने पायी अपनी छांह घनी  ----------मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ आपको  सादर समर्पित //

मैथिलीशरण गुप्त जी की यह पंक्तियाँ मुझको समर्पित करके आपने मेरी रचना को बहुत मान दिया है।

आपका हार्दिक आभार, आदरणीय गोपाल नारायन जी।

Comment by vijay nikore on May 29, 2015 at 7:11am

आदरणीय समर कबीर जी, सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार।

सादर।

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