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गज़ल - बचपने में ही सभी बच्चे सयाने हो गये ( गिरिरज भंडारी )

तरही ग़ज़ल -

2122    2122   2122   212

तेज़ रफ़्तारी के सारे जब दिवाने हो गये

दूरियाँ सिमटीं नगर तक आस्ताने हो गये

 

अहदे नौ में टीव्ही ने तो यूँ मचाया है वबाल

बचपना में ही सभी बच्चे सयाने हो गये

 

जिस तरह फेरा ग़मों का लग रहा है घर मेरे

यूँ लगा मुझको ग़मों से दोस्ताने हो गये

 

अब नई तहज़ीब के पेशे नज़र , सारे ज़ईफ

नौजवानों के लिये , कपड़े पुराने हो गये

 

इंतख़ाबी , इंतज़ामी थे सभी वो वाक़िये

आप ये मत बोलिये जाने अजाने हो गये

 

कुछ तो छींटे मारिये इस सम्त भी खुश रंग के

हम कभी तो कह सकें अब दिन सुहाने हो गये  

 

आपकी नज़रे करम का क्या असर है, क्या कहूँ

दर्द के लम्हें खुशी के कारखाने हो गये

 

आपने क्यों छू दिया मिसरों को मेरे प्यार से

सरकशी सब खो गई , प्यारे तराने हो गये

 

आप क्या आये कि सारी बज़्म रोशन हो गई  

'' चाँद क्या उभरा कि सब मंज़र सुहाने हो गये ''

 ******************************************** 

मौलिक एवँ अप्रकाशित ( संशोधित )

Views: 812

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2015 at 10:36am

आदरणीय जितेन्द्र भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2015 at 10:35am

आदरणीय विजय भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 23, 2015 at 10:35am

आदरणीय मिथिलेश भाई , सराहना के लिये आपका आभार । मै पहले बचपने लिखा था , जिसे आ. वीनस भाई जी की सलाह से बचपना किया हूँ ,हेडिंग मे सुधारना भूल गया हूँ , वहाँ अभी भी बचपने ही लिखा है !! 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 23, 2015 at 8:58am

बहुत ही खूबसूरत गजल कही है,आदरणीय गिरिराज जी. शेर दर शेर दिली बधाई कुबूल कीजियेगा

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 23, 2015 at 8:45am
तेज़ रफ़्तारी के सारे जब दिवाने हो गये
दूरियाँ सिमटीं नगर तक आस्ताने हो गये
बहुत खूब, शानदार, बधाई, आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on April 22, 2015 at 11:11pm

आदरणीय गिरिराज सर बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई 

बचपन को बचपना या बचपने नहीं तो ....बालपन कर सकते है क्या ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 19, 2015 at 12:38pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , सराहना के लिये अपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 19, 2015 at 12:38pm

आदरणीय सम्र कबीर भाई , गज़ल पर आपकी उत्सहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक आभार ॥

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 18, 2015 at 4:32pm
आदरणीय गिरिराज जी, अच्छे अश’आर हुए हैं। बाकी वीनस भाई ने कह ही दिया है।
Comment by Samar kabeer on April 18, 2015 at 10:51am
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,वाह वाह वाह ! बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है,गिराह भी ख़ूब लगाई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

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