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गीत / नवगीत - बर्तन भांडे चुप चुप सारे ( गिरिराज भंडारी )

बर्तन भांडे चुप चुप सारे

*************************

बर्तन भांडे चुप चुप सारे

चूल्हा देख उदासा है

टीन कनस्तर खाली खाली

माचिस देख निराशा है

 

लकड़ी की आँखें गीली बस 

स्वप्न धूप के देख रही 

सीली सीली दीवारों को

मन मन में बस कोस रही

 

पढा लिखा संकोची बेलन 

की पर सुधरी भाषा है

बर्तन भांडे चुप चुप सारे

चूल्हा देख उदासा है

 

स्वाभिमान बीमार पडा है

चौखट चौखट घूम रहा

गिर गिर पड़ता है, हर दर में

जैसे चौखट चूम रहा

 

थाली का आकार बिगड़ अब

लगता जैसे कासा है

बर्तन भांडे चुप चुप सारे

चूल्हा देख उदासा है

 

थोड़ी हवा चली, इच्छाएं

आँगन तक ले आये हैं

पल भर को जो धूप खिली थी 

इनको भी दिखलाये हैं

 

जब तक सांस बची है अपनी

तब तक रखनी आशा है 

बर्तन भांडे चुप चुप सारे

चूल्हा देख उदासा है

*****************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 17, 2014 at 9:38pm
स्वाभिमान बीमार पडा है
चौखट चौखट घूम रहा
गिर गिर पड़ता है, हर दर में
जैसे चौखट चूम रहा
विवशताओं को चित्रित करती इस रचना के लिए बधाई , आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , सादर।
Comment by somesh kumar on December 17, 2014 at 9:13pm

वाह ! आदरणीय पहली बार आपका नवगीत पढ़ रहा हूँ |आप की गजलों की ही तरह ही सधा और सार्थक है |बधाई स्वीकार करें 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 17, 2014 at 7:51pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी सर सुन्दर नवगीत। बधाई।
जब तक सांस बची है अपनी
तब तक रखनी आशा है
बर्तन भांडे चुप चुप सारे
चूल्हा देख उदासा है
बहुत सुन्दर।
Comment by gumnaam pithoragarhi on December 17, 2014 at 7:50pm

वाह सर जी खूब रचना है मजा आ गया छोटी चीजो को गीत बनाना कमाल है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 17, 2014 at 7:25pm

आदरणीय गिरिराज सर अच्छा रवाँ गीत लिखा है आपने बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Neeraj Nishchal on December 17, 2014 at 12:56pm
सीली सीली दीवारोँ को मन ही मन मेँ कोस रही ।

बहुत ही सुंदर और अर्थपूर्ण नवगीत के लिये बहुत बहुत बधाई स्वीकारेँ आदरणीय गिरिराज भाई ।

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