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हार गया समय ..(विजय निकोर)

हार गया समय ... !

 

 

कि जैसे अतिशय चिन्ता के कारण

आसमान काँपा

आज कुछ ज़्यादा अकेला

थपथपा रहा हूँ

कोई भीतरी सोच और

अनुभवों की द्दुतिमान मंणियाँ ...

तुम्हारी स्मृतिओं की सलवटों के बीच

मेरे स्नेह का रंग नहीं बदला

हार गया समय

समझौता करते ...

 

 

एकान्त-प्रिय निजी कोने में

दम घुटती हवा

अँधेरे का फैलाव, उस पर

कल्पना का नन्हा-सा आकाश

टंके हुए हैं वहाँ बेचैन खयालों में

धुँधले-से आकार के

पुराने परिचित रुआँसे साँवले सपने

चिर-प्रतीक्षित, कि आओगी तुम, आओगी,

हार गया समय

समझौता करते ...

 

 

अतीत के पिंजर से झाँकते

यौवन के यह साँवले सपने

आकाशी तारों-से यह आत्मा से चिपके

उन सपनों के यौवन का एहसास

महकता है लगातार, अभी भी ...

आश्चर्य ! आस्था की ढिबरी की

लो की रोशनी, मद्धम,

अग्नि-मणि-सी अभी तक टिमटिमा रही है

हार गया समय

समझौता करते ...

 

 

-------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1017

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 2, 2014 at 7:35am

आदरणीय  विजय भाई ,

 नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ अति सुंदर  रचना  की भी हार्दिक बधाई.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 1, 2014 at 11:20pm

तुम्हारी स्मृतिओं की सलवटों के बीच

मेरे स्नेह का रंग नहीं बदला

हार गया समय

समझौता करते .......अति  गहरे भाव सुंदर शब्द संयोजन , बधाई स्वीकारें आदरणीय विजय जी

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 1, 2014 at 6:22pm
वाह क्या बात है सुन्दर रचना आदरणीय निकोर जी!
भावविह्वलकारी
नववर्ष की अनेकश: शुभकामनाएं।
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on January 1, 2014 at 6:03pm

हार गया समय समझौते करते करते - आपकी मार्मिक भावनाओं की अविरल बहती गंगा के आगे समय भी हार गया आदरणीय श्री विजय निकोरे जी | ऐसे मोहक प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई और नव वर्ष की हार्द्सिक मंगल कामनाए 

Comment by Sushil Sarna on January 1, 2014 at 3:32pm

waaaaaaaaaah ati sundr ....ghan bhaavon kee mohak prastuti....is sundr prastuti ke liye haardik badhaaee aur nav varsh kee haardik shubhkaamnaayen aa.Vijay jee

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on January 1, 2014 at 1:19pm

आदरणीय  विजय भाई , नव वर्ष की शुभ कामनाओं के साथ आपको इसअति सुंदर  रचना  की भी हार्दिक बधाई॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 1, 2014 at 11:36am

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , बहुत गहरे प्रेम की अनुभूतियों को आपने लाजवाब शब्द संयोजन दिया है ॥ अति सुन्दर  !!  बधाइयाँ ॥

Comment by ajay sharma on December 31, 2013 at 10:33pm

अतीत के पिंजर से झाँकते

योवन के यह साँवले सपने...........kya sunder chitra kheecha hai ,,,,

Comment by coontee mukerji on December 31, 2013 at 10:02pm

 

अतीत के पिंजर से झाँकते

योवन के यह साँवले सपने

आकाशी तारों-से यह आत्मा से चिपके

उन सपनों के योवन का एहसास

महकता है लगातार, अभी भी ...

आश्चर्य ! आस्था की ढिबरी की

लो की रोशनी, मद्धम,

अग्नि-मणि-सी अभी तक टिमटिमा रही है....भावों का इतना सुंदर संचयन...समय तो हारेगा  ही.अतीत में खोना सुखद स्मूतियाँ के साथ एक प्रकार से चिरानंद को प्राप्त करना है......विजय जी,सादर प्रणाम.

Comment by Priyanka singh on December 31, 2013 at 9:32pm

अतीत के पिंजर से झाँकते

योवन के यह साँवले सपने

आकाशी तारों-से यह आत्मा से चिपके

उन सपनों के योवन का एहसास

महकता है लगातार, अभी भी ...

आश्चर्य ! आस्था की ढिबरी की

लो की रोशनी, मद्धम,

अग्नि-मणि-सी अभी तक टिमटिमा रही है

हार गया समय

समझौता करते .....क्या खूब कहा विजय सर .......लाजवाब शब्दों का अनूठा संजोग पिरोया है आपने ......नव वर्ष की शुभकामनायें सहित .......भावपूर्ण रचना के लिए बधाई 

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