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करवट  बदल रहा है कोई

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शर्मसार नहीं हैं हम, हार कर भी ,

हाँ ,सदमे में जरूर  हैं , कि-

नींद में करवट, बदल रहा है कोई

 

जातिवाद का ज़हर

-----------------------

तुम नीलकंठ कहलाते हो ,

ज़हर कोई, कभी पिया होगा ,

एक बार जातिवाद का ज़हर,

चखकर तो दिखाओ ,

तांडव करने को मजबूर हो जाओगे

सांप का काटा

 -----------------

सांप का काटा भी मरहम बन जाता है ,

इंसान, इंसान को डसकर जब आता है

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 19, 2013 at 10:52pm

आदरणीय दिलीपभाईजी,

आपकी तीनों क्षणिकायें प्रभावशाली हैं .. . हृदय से बधाई स्वीकारें.

सादर

Comment by vijay nikore on December 14, 2013 at 12:03am

अति सुन्दर। बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 13, 2013 at 10:06am

बहुत सशक्त प्रभावोत्पादक  क्षणिकाएं 

दूसरी और तीसरी बहुत पसंद आयीं 

हार्दिक बधाई.

Comment by coontee mukerji on December 12, 2013 at 6:59pm

बहुत ही दमदार क्षणिकाएँ.हार्दिक बधाई

Comment by Sushil Sarna on December 12, 2013 at 1:45pm

bahad khoobsoorat kshanikaayen....antim vishesh roop se sundr....haardik badhaaee is khoobsoorat lekhan ke liye aadrneey Dilip Mittal jee


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 12, 2013 at 7:36am

आदरणीय , बहुत सुन्दर क्षणिकाये लगीं !!!! आपको बधाई !!!! सांप का काटा विषेश !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2013 at 10:06pm

बहुत अच्छी क्षणिकायें हैं आदरणीय डॉ मित्तल सर बधाई आपको

Comment by ram shiromani pathak on December 11, 2013 at 7:07pm

बहुत ही सुन्दर क्षणिकाए हुई है  आदरणीय ……। हार्दिक बधाई आपको ,,,,,,सादर 

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