For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

परेशां है समंदर तिश्नगी से - ग़ज़ल

परेशां है समंदर तिश्नगी से 
मिलेगा क्या मगर इसको नदी से

अमीरे शहर उसका ख़ाब देखे  

कमाया है जो हमने मुफलिसी से

 

पुराना मस्अला ये तीरगी का 
कभी क्या हल भी होगा रोशनी से 

यहीं तो खुद से खा जाता हूँ धोका 
निभाना चाहता हूँ मैं सभी से 

नदी वाला तिलिस्मी ख़्वाब टूटा 
भरा बैठा हूँ अब मैं तिश्नगी से 

भुला बैठे जो रस्ता उस गली का  
गुज़रना हो गया किस किस गली से

 

खुशामद भर है जो महबूब की तो,  
मुझे आजिज समझिए शाइरी से

 

पुराना है मेरा लहज़ा यकीनन

मगर बरता है किस शाइस्तगी से

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 446

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by वीनस केसरी on May 2, 2013 at 12:28am

vijay nikore ji  HARDIK AABHAR

Comment by vijay nikore on April 29, 2013 at 7:05pm

बहुत ही उम्दा गज़ल के लिए बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by वीनस केसरी on April 28, 2013 at 2:31pm

भावना जी,

हार्दिक आभारी हूँ 

Comment by भावना तिवारी on April 28, 2013 at 2:26pm

भुला बैठे जो रस्ता उस गली का  
गुज़रना हो गया किस किस गली से..............पुराना है मेरा लहज़ा यकीनन

मगर बरता है किस शाइस्तगी से........SADAA KI TARAH UNMDAA SHER वीनस केसरी JI ....BADHAAI .......

Comment by वीनस केसरी on April 28, 2013 at 2:09pm

dr. prachi ji dhanyvaad 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 28, 2013 at 1:03pm

खूबसूरत गज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय वीनस जी 

ये दो शेर खास पसंद आये..

यहीं तो खुद से खा जाता हूँ धोका 
निभाना चाहता हूँ मैं सभी से 

भुला बैठे जो रस्ता उस गली का  
गुज़रना हो गया किस किस गली से

सादर. 

Comment by वीनस केसरी on April 27, 2013 at 11:09pm

श्याम जी, सौरभ जी, प्रदीप जी, केवल जी, अशोक जी,

ग़ज़ल को अपना बहुमूल्य समय दे कर आशिर्वचन से अभिसिंचित करने हेतु आप सभी का हार्दिक आभारी हूँ
सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 26, 2013 at 11:12pm

यहीं तो खुद से खा जाता हूँ धोका 
निभाना चाहता हूँ मैं सभी से ............वाह! बहुत बढ़िया कहा है.

सादर बहुत बहुत बधाई स्वीकारें आदरणीय वीनस जी सुन्दर गजल पर.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 26, 2013 at 6:45pm

आदरणीय वीनस जी,    अतिसुन्दर!  लाजवाब शे‘र ।  कितनी सादगी से बयां कि  ’पुराना है मेरा लहज़ा यकीनन!  मगर बरता है किस शाइस्तगी से!!’   हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 26, 2013 at 3:50pm

परेशां है समंदर तिश्नगी से 
मिलेगा क्या मगर इसको नदी से

अमीरे शहर उसका ख़ाब देखे  

कमाया है जो हमने मुफलिसी से

आदरणीय वीनस जी शानदार शेर हेतु सादर बधाई 

 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Usha Awasthi posted a blog post

सब एक

सब एक उषा अवस्थी सत्य में स्थित कौन किसे हाराएगा? कौन किससे हारेगा? जो तुम, वह हम सब एक ज्ञानी वही…See More
14 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post एक अनबुझ प्यास लेकर जी रहे हैं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"शंका निवारण करने के लिए धन्यवाद आदरणीय धामी भाई जी।"
20 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post एक अनबुझ प्यास लेकर जी रहे हैं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, निम्न पंक्तियों को गूगल करें शंका समाधान हो जायेगा।//अपने सीपी-से अन्तर में…"
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (जबसे तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (जबसे तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया)
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। अच्छी समसामयिक गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Chetan Prakash's blog post गज़ल
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कभी तो पढ़ेगा वो संसार घर हैं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई इन्द्रविद्यावाचस्पति जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted blog posts
yesterday
indravidyavachaspatitiwari commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कभी तो पढ़ेगा वो संसार घर हैं - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"जमाने को अच्छा अगर कर न पाये, ग़ज़ल के लिए धन्यवाद।करता कहना।काश सभी ऐसा सोचते?"
yesterday
AMAN SINHA posted a blog post

किराए का मकान

दीवारें हैं छत हैंसंगमरमर का फर्श भीफिर भी ये मकान अपना घर नहीं लगताचुकाता हूँमैं इसका दाम, हर…See More
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post एक अनबुझ प्यास लेकर जी रहे हैं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"//अनबुझ का अर्थ यहाँ कभी न बुझने वाली के सन्दर्भ में ही लिया गया है। हिन्दी में इसका प्रयोग ऐसे भी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post केवल बहाना खोज के जलती हैं बस्तियाँ - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व सुझाव के लिए आभार। "
Saturday

© 2022   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service