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किसी दिन मर न जाएँ हम खुशी से - वीनस

मुलाकातें हमारी, तिश्नगी से
किसी दिन मर न जाएँ हम खुशी से

महब्बत यूँ मुझे है बतकही से
निभाए जा रहा हूँ खामुशी से

उन्हें कुछ काम शायद आ पड़ा है
तभी मिलते हैं मुझसे खुशदिली से

उजाला बांटने वालों के सदके
हमारी निभ रही है तीरगी से

ये कैसी बेखुदी है जिसमे मुझको

मिलाया जा रहा हैं अब मुझी से

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से

खबर से जी नहीं भरता हमारा

मजा आता है केवल सनसनी से

अना के वास्ते खुद से लड़ा मैं
तअल्लुक तोड़ बैठा हूँ सभी से

ये बेदारी, ये बेचैनी का आलम
मैं आजिज आ गया हूँ शाइरी से



बह्र-ए-हजज मुसद्दस महज़ूफ़
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 672

Comment

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Comment by वीनस केसरी on April 23, 2013 at 10:10pm

पाठक जी धन्यवाद

Comment by ram shiromani pathak on April 23, 2013 at 9:39pm

महब्बत यूँ मुझे है बतकही से
निभाए जा रहा हूँ खामुशी से //////

बेहद सुन्दर गजल।हार्दिक बधाई स्वीकारें। सादर

Comment by वीनस केसरी on April 23, 2013 at 9:27pm

Ashok Kumar Raktale JI HARDIK AABHAR

Comment by Ashok Kumar Raktale on April 23, 2013 at 1:14pm

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से..... हमेशा कड़वी दवाई देता है  कभी डाक्टर ये भी तो कहे "आओ कुछ मीठा हो जाये......."

खबर से जी नहीं भरता हमारा

मजा आता है केवल सनसनी से........... अजीब पागलपन है.

आदरणीय वीनस जी बहुत सुन्दर गजल कही है. सभी अशआर सुन्दर हैं.बहुत बहुत दाद कुबुलें.

Comment by वीनस केसरी on April 23, 2013 at 12:53am

सौरभ जी, डॉ. अजय खरे जी आपका हार्दिक आभार

आशीष जी,
अश्आर  ो   आपको पसंद आए, जान कर बेहद खुशी हुई

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on April 22, 2013 at 9:36pm

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से  ||

वाह वाह !!! भाई वीनस जी लाजवाब अशआरों से सजी उम्दा ग़ज़ल |
दाद कुबूल कीजिये.....

Comment by Dr.Ajay Khare on April 22, 2013 at 1:18pm

keshri ji sunder rachana ke liye badhai


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 22, 2013 at 8:45am

इधर प्रवास और कड़े स्केड्युल के कारण देर से आपकी ग़ज़ल पर आ पाया हूँ.

हर शेर कमाल-कमाल हुआ है. कुछ तो देर तक मथते हैं.

महब्बत यूँ मुझे है बतकही से
निभाए जा रहा हूँ खामुशी से

उजाला बांटने वालों के सदके
हमारी निभ रही है तीरगी से

ये कैसी बेखुदी है जिसमे मुझको

मिलाया जा रहा हैं अब मुझी से

उतारो भी मसीहाई का चोला
हँसा बोला करो हर आदमी से

अना के वास्ते खुद से लड़ा मैं

तअल्लुक तोड़ बैठा हूँ सभी से

अपने-अपने परिप्रेक्ष्य में हुए ये शेर देर तक मन में खौलते हैं. बहुत-बहुत बधाई इस ग़ज़ल पर. ढेर सारी दाद दे रहा हूँ. 

Comment by वीनस केसरी on April 22, 2013 at 12:09am

इस हौसला अफजाई के लिए आप सभी का हार्दिक आभार ....

Comment by Abhinav Arun on April 20, 2013 at 8:56am

उतारो भी मसीहाई का चोला 
हँसा बोला करो हर आदमी से 

 *****

खबर से जी नहीं भरता हमारा

मजा आता है केवल सनसनी से

वाह वाह श्री वीनस जी क्या कहने ग़ज़ल का हर शेर रवां है और बाअसर , एक यादगार और मुहावरों सी जुबां पे चढ़ जाने वाली ग़ज़ल के लिए तहे दिल से मुबारकबाद !!

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