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ये धरती कब क्या कुछ कहती है

सब कुछ अपने पर सहती है,

तूफान उड़ा ले जाते मिटटी,

सीना फाड़ के नदी बहती है !

सूर्यदेव को यूँ देखो तो,

हर रोज आग उगलता है,

चाँद की शीतल छाया से भी,

हिमखंड धरा पर पिघलता है !

ऋतुयें आकर जख्म कुदेरती,

घटायें अपना रंग जमाती,

अम्बर की वो नीली चादर,

पल पल इसको रोज़ सताती !

हम सब का ये बोझ उठाकर,

परोपकार का मार्ग दिखाती,

सहन शीलता धर्मं है अपना,

हमको जीवन जीना सिखाती !

- रचना - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

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Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on February 15, 2013 at 1:16pm

सभी मित्रों का बहुत बहुत धनयवाद आप का स्नेह और आशीर्वाद सदा यूँ ही बना रहे 

Comment by Poonam Matia on February 15, 2013 at 2:31am

सुंदर भाव एवं शब्द 

Comment by upasna siag on February 14, 2013 at 6:20pm

बहुत बढ़िया जी 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 14, 2013 at 1:53pm
आदरणीय फरियादी जी सादर 
बहुत सुन्दर द्वीपदियाँ रची हैं आपने बधाई हो 
Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on February 14, 2013 at 10:25am

सभी मित्रों का बहुत बहुत धनयवाद आप का स्नेह और आशीर्वाद सदा यूँ ही बना रहे 

Comment by vijay nikore on February 14, 2013 at 8:35am

हम सब का ये बोझ उठाकर,

परोपकार का मार्ग दिखाती,

बहुत अच्छे भाव हैं।

विजय निकोर

Comment by आशीष नैथानी 'सलिल' on February 13, 2013 at 11:23pm

तूफान उड़ा ले जाते मिटटी,

सीना फाड़ के नदी बहती है .......  बहुत सुन्दर राजेन्द्र भाई....


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 13, 2013 at 8:44pm

सुन्दर द्विपदियाँ हेतु बधाई फरियादी जी ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 13, 2013 at 7:48pm

पृथ्वी की सहनशीलता को आपके नज़रिए से पढना रुचिकर है..

हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 13, 2013 at 6:04pm

धरती के ऊपर बहुत अच्छी भावपूर्ण रचना लिखी है हार्दिक बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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