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नमन करूँ मैं इस धरती माँ को,
जिसने मुझको आधार दिया,
पल पल मर कर जीने का
सपना ये साकार किया !
हिम शिखर के चरणों से मैं,
दुःख मिटाने निकला था,
किसी ने रोका मुझे भंवर में,
कोई प्यासा दूर खड़ा था !
कभी आँखों से टपका मैं,
कभी बादल बनकर बरसा हूँ,
कभी सिमट कर इस माटी में,
नदी नालों में बहता हूँ
कब कहाँ किसके काम आऊँ
मैं कहाँ इतना ज्ञानी हूँ
सब के तन मिटे इस माटी में
मैं तो फिर भी पानी हूँ !

– रचना – राजेन्द्र सिंह कुँवर ‘फरियादी’

 

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Comment by रविकर on February 27, 2013 at 4:44pm

सुन्दर रचना -
शुभकामनायें आदरणीय -

Comment by pawan amba on February 27, 2013 at 4:30pm

कब कहाँ किसके काम आऊँ
मैं कहाँ इतना ज्ञानी हूँ...waahh..Faiyaadi sahab...aapka to jawaab hi nahi.....shaandaar...

Comment by राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' on February 26, 2013 at 10:26am

सभी मित्रों का हार्दिक आभार आप का स्नेह और आशीर्वाद मेरे शव्दों को यूँ ही मिलता रहे ! 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 25, 2013 at 10:01pm
आदरणीय राजेंद्र जी!बहुत ही अच्छी कविता है।बधाई
//हिम शिखर के चरणों से मैं,
दुःख मिटाने निकला था,
किसी ने रोका मुझे भंवर में,
कोई प्यासा दूर खड़ा था !
कभी आँखों से टपका मैं,
कभी बादल बनकर बरसा हूँ,//
वाह क्या कहने।
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 25, 2013 at 8:16pm

बहुत सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिये


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2013 at 6:51pm

जल की निर्झारता को बहुत सुन्दर शब्दों में अभिव्यक्त किया है, हार्दिक बधाई 


पल पल मर कर जीने का
सपना ये साकार किया !............... (दूजों के हित जीने का) या इसी तरह का कोई वाक्यांश शायद भावानुरूप रहेगा...

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 25, 2013 at 6:26pm

सुन्दर रचना, सुंदर कल्पना, अच्छा भाव, बधाई राजेन्द्र सिंह फरियादी जी 

Comment by बृजेश नीरज on February 25, 2013 at 6:16pm

बहुत सुन्दर!

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