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हूँ किसके ग़म का सताया न पूछिये साहिब (ग़ज़ल)

1212 / 1122 / 1212 / 22(112)

हूँ किसके ग़म का सताया न पूछिये साहिब

जफ़ा-ए-इश्क़ का क़िस्सा न पूछिये साहिब [1]

तमाम उम्र उसे दूर से ही देख के बस

सुकून कितना है पाया न पूछिये साहिब [2]

लहू भी थम सा गया दर्द को भी राहत है

प ज़ख़्म कितना है गहरा न पूछिये साहिब [3]

अगरचे जब मैं चला था तो हाथ ख़ाली थे

सफ़र में क्या है गँवाया न पूछिये साहिब [4]

ग़ुरूर उनको किसी बात पर नहीं है मगर

इसी पे नाज़ है कितना न पूछिये साहिब [5]

तमाम ज़िन्दगी ठहराव के तजस्सुस में

कहाँ कहाँ नहीं भटका न पूछिए साहिब [6]

पता है मुझको ये 'शाहिद' कहाँ से आया हूँ

मगर किधर को है जाना न पूछिए साहिब [7]

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 1, 2022 at 6:49pm

बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय रवि जी...

Comment by vijay nikore on November 1, 2022 at 12:03pm

कमाल की गज़ल लिखी है, रवि भसीन शाहिद जी।

हार्दिक बधाई।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 31, 2022 at 11:17am

आदरणीय जैफ़ साहिब, सुख़न-नवाज़ी और हौसला-अफ़ज़ाई के लिए आपका बहुत शुक्रिय:!

Comment by Zaif on October 30, 2022 at 2:40pm

बेहतरीन ग़ज़ल हुई है, सर।

अगरचे जब मैं चला था तो हाथ ख़ाली थे

सफ़र में क्या है गँवाया न पूछिये साहिब।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 19, 2022 at 9:38am

आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' भाई, सादर अभिवादन। सुख़न -नवाज़ी के लिए आपका बहुत शुक्रिया!

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 19, 2022 at 3:42am

आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। खूबसूरत गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Mahendra Kumar on October 18, 2022 at 9:41pm

आदरणीय रवि जी, बहुत शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इतनी ज़हमत उठा कर मेरी ग़ज़ल पढ़ी। यह अदब से आपकी मुहब्बत को ही दर्शाता है। उस ग़ज़ल के दो-तीन शेर मैंने संशोधित कर/बदल दिए हैं। ख़ैर, आपकी मुहब्बतों के लिए दिल से आभारी हूँ। 

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 18, 2022 at 5:52pm

आदरणीय महेंद्र कुमार जी, बधाई और शुभकामनाओं के लिए हार्दिक आभार! ओबीओ लाइव तरही मुशायरा अंक 83 में तलाश करके आपकी ग़ज़ल पढ़ी, बहुत अच्छी लगी। बहुत शुक्रिय: और शुभकामनाएँ!

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on October 18, 2022 at 5:52pm

आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम समर कबीर साहिब, आपसे दाद और आशीर्वाद पाकर ग़ज़ल कहने का प्रयास सार्थक हुआ। आपका बहुत बहुत शुक्रिय:!

Comment by Mahendra Kumar on October 18, 2022 at 2:15pm

आदरणीय रवि जी, उम्दा ग़ज़ल हुई है। ढेरों बधाई व शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए। आपके आख़िरी शेर ने मुझे अपने एक शेर की याद दिला दी :

मुझे पता है ये सूरज किधर पे डूबेगा
मगर ये याद नहीं है किधर से निकला था

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