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गुण्डे समूची फौज ले थाने पे आ गये -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"


२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
बाबर से यार  जो  भी बुलाने पे आ गये
इतिहास लिख के झूठ छुपाने पे आ गये।१।
*
अनबन से घर की गैर जो न्योते गये कभी
अपनों के बाद खुद भी निशाने पे आ गये।२।
*
पुरखों को अपने भूल के अपनाते गैर को
ये  कौन  लोग  देश  जलाने  पे  आ  गये।३।
*
कानून कैसे आज भी पहले सा है विवश
गुण्डे समूची  फौज  ले  थाने  पे आ गये।४।
*
गुजरा वो दौर बम से जो दहले था देश पर
पत्थर से  आज  शान्ति  उड़ाने  पे जा गये।५।
*
आपस का प्रेम  कैसे  सलामत रहे भला
नफरत के बीज सब ही उगाने पे आ गये।६।
*
बँटकर के नाम धर्म के सोचा सुकून हो
उन में से कौन देश ठिकाने पे आ गये।७।
*
दुनिया की कोशिशों से जो मेटे मिटे नहीं
हस्ती स्वयम् की आज मिटाने पे आ गये।८।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2022 at 2:23pm

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और प्रशंसा के लिए धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 13, 2022 at 1:59pm

आ. भाई सोनांचली जी, सादर अभिवादन। रचना पर उपस्थिति के लिए धन्यवाद। 

इस रचना में किसके साथ और किस वक्तव्य से अन्याय हुआ है यह भी स्पष्ट कर देते तो आपकी बात को समझने व प्रत्युतर देने में सहूलियत होती। मेरा सदा प्रयास रहता है कि सम्यक, तथ्यपरक सही बात ही लिखी जाय। यहाँ कौन सी बात उनुचित लगी स्पष्ट करने की कृपा करें। सादर...

Comment by नाथ सोनांचली on June 13, 2022 at 10:45am

आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफिरजी सादर अभिवादन। मेरा मानना है कि साहित्यकार को सदैव पंच परमेश्वर की तरह संतुलित लिखना चाहिए। सम्यक सोच हो, यही हनारी कामना है। सादर

Comment by Chetan Prakash on June 13, 2022 at 8:16am

आदाब, भाई, मुसाफिर साहब, सराहनीय सोच से सम्पृक्त एक अच्छी गज़ल प्रस्तुति हेतु आपको बधाई प्रेषित करता हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

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