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संख्या का खेल देश में मन्जूर अब नहीं-(गजल)

आओ कसम लें देश जलाया न जाएगा
अब एक दूसरे  को  चिढ़ाया न जाएगा।।
*
यह देश राम श्याम से विक्रम भरत से है
वन्शज इन्हीं के सारे भुलाया न जाएगा।।
*
मंगोल हूण शक या मुगल आर्य जो भी हैं
आपस में इन को और लड़ाया न जाएगा।।
*
बाबर की भूल आज भी जुम्मन गले लगा
सबको कसम है ऐसा सिखाया न जाएगा।।
*
संख्या का खेल देश में मन्जूर अब नहीं
कोई भी भेद-भाव  हो  गाया न जाएगा।।
*
होगी समान न्याय की जब रीत देश में
तब बेकसूर  कोई  सताया  न  जाएगा।।
*
शासन भी सौं ले निष्ठ हो सेवा करेगा नित
जो भी है  सत्य  और  छिपाया  न जाएगा।।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 16, 2022 at 8:38am

आ. भाई दयाराम जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Dayaram Methani on June 15, 2022 at 10:56pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, अति सुंदर संदेशपरक रचना।

कृपया ध्यान दे...

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