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हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२


हमने कहीं पे लौट आ बचपन क्या लिख दिया
बोली जवानी क्रोध  में दुश्मन क्या लिख दिया।१।
*
घर के बड़े  भी  काट  के  पेड़ों  को  खुश हुए
बच्चों ने चौड़ा चाहिए आँगन क्या लिख दिया।२।
*
तस्कर तमाम  आ  गये  गुपचुप  से  मोल को
माटी को यार देश की चन्दन क्या लिख दिया।३।
*
आँखों से उस की धार  ये  रुकती नहीं है अब 
भाता है जब से आपने सावन क्या लिख दिया।४।
*
वो  सब  विहीन  रीड़  के  श्वानों  से  बन  गये
कुत्तों के हिस्से सेठ ने माखन क्या लिख दिया।५।
*
हँसती  हो  मौत  देख  के  खुशियों  में  छेद ये
निर्धन के हिस्से ईश ने जीवन क्या लिख दिया।६।


(४-४-२१)
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 20, 2021 at 10:45am

आ. भाई बसंत जी, सादर अभिवादन। गजल पर आपकी मनोहारी टिप्पणी से मन हर्षित हुआ । उपस्थिति व सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on April 20, 2021 at 10:24am

आदरणीय धामी जी सादर नमस्कार 

अद्भुत गजल हुई है आदरणीय 

आनंद आ गया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 17, 2021 at 6:57pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, हार्दिक धन्यवाद।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 16, 2021 at 9:00am

बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 15, 2021 at 8:40am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, धन्यवाद।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 15, 2021 at 8:39am

आ. भाई आज़ी तमाम जी, अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, सराहना व सलाह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 13, 2021 at 9:26am

//हँसते धनी हैं देख के खुशियाँ कटी फटी//

आपके भावों के अनुसार ये मिसरा फ़िट है। 

Comment by Aazi Tamaam on April 13, 2021 at 8:13am

बेहतरीन ग़ज़ल है आदरणीय धामी सर

सादर प्रणाम

गुस्ताखी माफ़ हो मैंने एक लाइन लिक्खी है इससे शायद कुछ और बेहतरीन बन सके देखियेगा

"दुश्मन हर इक गरीब के फ़िर हो गये धनी"

निर्धन के हिस्से ईश ने जीवन क्या लिख दिया

सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 13, 2021 at 7:52am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद । 

इंगित शेर को इस प्रकार दे खिएगा-

हँसते धनी हैं देख के खुशियाँ कटी फटी

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 11, 2021 at 12:48pm

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ।

'हँसती हो मौत देख के खुशियों में छेद ये

निर्धन के हिस्से ईश ने जीवन क्या लिख दिया'    इस शे'र के ऊला का कथ्य समझ नहीं आया।  सादर। 

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