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ग़ज़ल सँभालना है मुझे

2122/1212/22

1
साँप बनकर जो डस रहा है मुझे
दोस्त कह कर पुकारता है मुझे
2
उसका लहज़ा बता रहा है मुझे
अब न पहले सा चाहता है मुझे
3
दिल के चैन ओ सुकून की खातिर
ख़ुद को ख़ुद में ही ढूँढना है मुझे
4
हर घड़ी जिसको दिल में रखता हूँ
वो ही अंजान कह रहा है मुझे
5
क्यों पराया हुआ मैं अपनों में
यह सवाल अब भी सालता है मुझे
6
मय-कदे से उठा वो यह कह कर
घर भी 'निर्मल' सँभालना है मुझे

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Rachna Bhatia on February 18, 2021 at 4:38pm

आदरणीया अमीरुद्दीन'अमीर'जी नमस्कार। हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by Rachna Bhatia on February 18, 2021 at 4:38pm

आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी, हौसला बढ़ाने के लिए आभार।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on February 16, 2021 at 5:37pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ, उस्ताद मुहतरम की इस्लाह पर ग़ौर कीजियेगा।  सादर।

Comment by gumnaam pithoragarhi on February 16, 2021 at 4:31pm

वाह बहुत खूब।, अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई।

Comment by Rachna Bhatia on February 14, 2021 at 8:15am

आदरणीय आज़ी तमाम जी नमस्कार। हौसला बढ़ाने के लिए आपकी आभारी हूँ।

Comment by Rachna Bhatia on February 14, 2021 at 8:14am

आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार। सर् ग़ज़ल पर इस्लाह देने के लिए बेहद शुक्रिय:। सर्,अब यह ग़लती याद रहेगी।इसे फेयर में ठीक कर लेती हूँ।सादर।

Comment by Rachna Bhatia on February 14, 2021 at 8:12am

आदरणीय लक्ष्मण धामी'मुसाफ़िर'जी नमस्कार। भाई हौसला बढ़ाने के लिए आपकी आभारी हूँ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2021 at 9:03pm

आ. रचना बहन , सादर अभिवादन । गजल का प्रयास अच्छा है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on February 13, 2021 at 7:24pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'दिल के चैन ओ सुकून की खातिर
ख़ुद को ख़ुद में ही ढूँढना है मुझे'

इस शैर के ऊला मिसरे में 'चैन' हिन्दी भाषा का शब्द है, इसलिये इज़ाफ़त का इस्तेमाल मुनासिब नहीं, पहले भी बताया जा चुका है, ऊला यूँ कह सकती हैं:-

'अपने दिल के सुकून की ख़ातिर

Comment by Samar kabeer on February 13, 2021 at 6:14pm

ग़लत कमेन्ट कर दिया ,क्षमा ।

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