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मयख़ाने आ गया हूँ ज़माने को छोड़कर (९६ )

(221 2121 1221 212 )

.

मयख़ाने आ गया हूँ ज़माने को छोड़कर

मत बैठ साक़ी आज यूँ रुख़ अपना मोड़कर

**

आँखों से अब पिला कि दे जाम-ए-शराब तू

साक़ी सुबू में डाल दे ग़म को निचोड़कर

**

वक़्ते-क़ज़ा अगर यहीं रहने हैं ज़र-ज़मीँ

पी लूँ ज़रा सी क्या करूँ दौलत को जोड़ कर

**

कोई कभी शिकस्त मुझे दे न पाएगा

बादा-कशी में यार तू मुझसे न होड़ कर

**

पीकर ज़रा कहासुनी मामूली बात है

मय के लिए न जाइये रिश्तों को तोड़ कर

**

उस पर लगानी चाहिए बंदिश जहाँ में जो

पीता शराब तिफ़्ल की गुल्लक को फोड़ कर

**

अब तक समझ न आई मुझे इक ज़रा सी बात

आते हैं लोग किसलिए मैखाने दौड़ कर

**

महॅंगी है की शराब उन्होंने ही जो कभी

रखते थे नाक और भौं इससे सिकोड़ कर

**

पीर-ए-मुग़ाँ वबा ने किया हाल है ख़राब

गाहक 'तुरंत'आ रहे बुर्के को ओढ़कर

**

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 8, 2020 at 3:35pm

भाई साहेब TEJ VEER SINGH  जी , आपकी हौसला आफ़जाई के लिए दिल से शुक्रिया | 

Comment by TEJ VEER SINGH on May 8, 2020 at 12:41pm

हार्दिक बधाई आदरणीय जी गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी जी ।बहुत बढ़िया गज़ल।।

कोई कभी शिकस्त मुझे दे न पाएगा

बादा-कशी में यार तू मुझसे न होड़ कर

**

पीकर ज़रा कहासुनी मामूली बात है

मय के लिए न जाइये रिश्तों को तोड़ कर

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 6, 2020 at 10:51pm

आदरणीय Samar kabeer साहेब , आदाब , आपकी हौसला आफ़जाई के लिए दिल से शुक्रिया |  ओह , मैंने ज़माना का लघु ज़माँ देखकर पैमाना का लघु पैमाँ कर दिया | पैमान कोई शब्द है मुझे पता नहीं था | सही करता हूँ सर | 

Comment by Samar kabeer on May 6, 2020 at 8:16pm

जनाब गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'पैमाँ में साक़ी डाल दे ग़म को निचोड़कर'

इस मिसरे में शायद आपने 'पैमाँ' 

का अर्थ पैमाने से लिया है,जबकि इसका अर्थ है,अह्द,वादा,शर्त वग़ैरह,देखियेगा ।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on May 6, 2020 at 4:25pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी ,  खाकसार का कलाम पसन्द करने और हौसला आफजाई का बेहद शुक्रिया

Comment by नाथ सोनांचली on May 6, 2020 at 6:16am

आद0 गिरधर सिंह गहलोत जी सादर अभिवादन। बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने। पढ़कर अच्छा लगा। 

मतला भी बेहतरीन। बधाई स्वीकार कीजिये

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