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ग़ज़ल बह्र फेलुन×5+फा


शैतानों की देखो दावत करता है
पापी है पर जन्नत जन्नत करता है ।
*******

कोई तुझे न देखे अच्छी नज़रों से
क्यों तू ऐसी वैसी हरकत करता है ।
*******

क्या होता है हाथों की रेखाओं में
मिहनत कर क्यों क़िस्मत क़िस्मत करता है ।
*******

काली काली बदली जब भी छाये तो
दहक़ाँ फिर बारिश की हसरत करता है ।
********

भेद नहीं है कोई उसकी नज़रों में
फिर क्यों तू औरों से नफ़रत करता है ।
*******

अता किया सबकुछ क़ुदरत ने उसको पर
वो तो हरदम दौलत दौलत करता है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित। ।

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Comment

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Comment by vijay nikore on September 27, 2018 at 11:40am

इस पर प्रतिक्रिया बहुत समय पहले दी थी, duplicate हो गई थी, तो अब एक को delete किया तो दोनों ही अपने आप delete हो गईं। हार्दिक बधाई, भाई आरिफ़ जी

Comment by Mohammed Arif on July 4, 2018 at 8:42pm

बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on July 4, 2018 at 8:39pm

मुहतरम जनाब आरिफ साहिब आ दाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबुल फरमाएं |

Comment by Mohammed Arif on July 3, 2018 at 9:45pm

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 3, 2018 at 7:39pm

आ. भाई आरिफ जी, खूबसूरत गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Mohammed Arif on July 2, 2018 at 8:52pm

हार्दिक आभार आदरणीय राज़ नवादवी जी ।

Comment by राज़ नवादवी on July 2, 2018 at 5:15pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब, बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने. बधाई हो. मतला भी बहुत सुन्दर बन पडा है. सादर 

Comment by Mohammed Arif on July 2, 2018 at 4:40pm

हार्दिक आभार आदरणीया नीलम उपाध्याय जी । लेखन सार्थक हो गया ।

Comment by Neelam Upadhyaya on July 2, 2018 at 4:15pm

आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, खूबसूरत गजल की पेशकश  के लिए मुबारकबाद कुबूल करें ।

Comment by Mohammed Arif on July 2, 2018 at 1:54pm

हार्दिक आभार आदरणीय बृजेश कुमार जी।

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