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व्यंग्य - अन्ना जी, आप भी...

‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना’, यहां भी अन्ना, वहां भी अन्ना’, ‘अन्ना नहीं ये आंधी है, नए भारत का गांधी है’, ऐसे ही कुछ नारों से पिछले दिनों रामलीला मैदान गूंजायमान था। तेरह दिनों तक चले अनशन के बाद अन्ना, गांधी जी के अवतरण कहेे जा रहे हैं। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि दुनिया में दूसरा गांधी, कोई हो नहीं सकता। खैर, अन्ना के आंदोलन के बाद दुनिया में एक अलग लहर चली है, आजादी की दूसरी लड़ाई की।

हमारे अन्ना अब चुनाव लड़ने की नहीं, लड़वाने की बात कह रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसे युवा जिनकी छवि बेदाग हो,… Continue

Added by rajkumar sahu on October 1, 2011 at 11:39pm — No Comments

सूखी नदी के सामने

(1)

मुकद्दर की बात.



कोशिशें करते रहो,सद्दाम की तरह.
मिल पाए न 'कुवैत' मुकद्दर की बात है.
ऊँची उठाओ मेढ़,हिफाज़त के वास्ते,
खा जाये फसल खेत,मुकद्दर की बात है.
मीलों  यूँ सफ़र करके ,समंदर का लौटिये,
बन जाये कबर रेत,मुकद्दर की बात है.
कतरे लहू के पीजिये,औलाद के लिए,
हो जाये खूं सफ़ेद,मुकद्दर की बात है.
(2)

हुकूमत के साथ-साथ ही दफ्तर बदल…

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Added by AVINASH S BAGDE on October 1, 2011 at 4:00pm — 6 Comments

तहे दिल से शुक्र गुज़ार

सबसे पहले मैं आप  सबसे माफ़ी चाहती हूँ कुछ मसरूफियत की वजह से मैं ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा  आप सबके खूबसूरत कमेंट्स  का शुक्रिया अदा नहीं कर पाई , मैं आप जैसे ज़हीन लोगो के  के बारे में क्या  लिखूं...यहाँ सब के सब इतने काबिल हैं 

 …
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Added by siyasachdev on October 1, 2011 at 1:53pm — 3 Comments

शान-ए-हिन्दोस्तान श्री जय देव 'विद्रोही'जी को 'कालिदास सम्मान' रिपोर्ट: दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

शान-ए-हिन्दोस्तान श्री जय देव 'विद्रोही'जी को 'कालिदास सम्मान'

रिपोर्ट: दीपक शर्मा 'कुल्लुवी' 


6 नबम्बर 2011 को नई दिल्ली स्थित मंडी हाउस  के निकट 'त्रिवेणी कला संगम' आडोटोरियम में आयोजित एक भव्य समारोह में आथर्स गिल्ड आफ  हिमाचल प्रदेश के संस्थापक अध्यक्ष,वरिष्ठ पत्रकार,लेखक कई पुस्तकों के रचयिता  श्री जय देव 'विद्रोही'जी को अखिल भारतीय…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 1, 2011 at 1:00pm — 2 Comments

हरिगीतिका



हरिगीतिका

(1)

मधु छंद सुनकर छंद गुनकर, ही हमें कुछ बोध है,

सब वर्ण-मात्रा गेयता हित, ही बने यह शोध है, 

अब छंद कहना है कठिन क्यों, मित्र क्या अवरोध है,

रसधार छंदों की बहा दें, यह मेरा अनुरोध है ||



(2)

यह आधुनिक परिवेश इसमें, हम सभी पर भार है,

यह भार भी भारी नहीं जब, संस्कृति आधार  है,

सुरभित सुमन सब है खिले अब, आपसे मनुहार है, 

निज नेह के दीपक जलायें, ज्योंति का…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 1, 2011 at 2:31am — 15 Comments

आशिकों को इस कदर दिलदार होना चाहिए

 

 

दिल  लगाना   हमने  सुना   है , एक गुनाह  है  यहाँ  

 सारी  दुनिया  को  फिर तो  गुनाहगार  होना  चाहिए ..

 

 

सुना  है , मजा    है बहुत , महबूब  के  इन्तजार  में  …

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Added by Rajeev Kumar Pandey on October 1, 2011 at 12:33am — 5 Comments

एक गीत: शेष है... --संजीव 'सलिल'

एक गीत:

शेष है...

संजीव 'सलिल'

*

किरण आशा की

अभी भी शेष है...

*

देखकर छाया न सोचें

उजाला ही खो गया है.

टूटता सपना नयी आशाएँ

मन में बो गया है.

हताशा कहती है इतना

सदाशा भी लेश है...

*

भ्रष्ट है आचार तो क्या?

सोच है-विचार है.

माटी का तन निर्बल

दैव का आगार है.

कालिमा अमावसी में

लालिमा अशेष है...

*

कुछ न कहीं खोया…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 30, 2011 at 1:41am — No Comments

व्यंग्य - गरीबी के झटके

देखिए, गरीबों को गरीबी के झटके सहने की आदत होती है या कहें कि वे गरीबी को अपने जीवन में अपना लेते हैं। पेट नहीं भरा, तब भी अपने मन को मारकर नींद ले लेते हैं। गरीबों को ‘एसी’ की भी जरूरत नहीं होती, उसे पैर फैलाने के लिए कुछ फीट जमीन मिल जाए, वह काफी होती है। गरीब, दिल से मान बैठा है कि अमीर ही उसका देवता है, चाहे जो भी कर ले, उसमें उसका बिगड़े या बने। गरीबी का नाम ही बेफिक्री है। फिक्र रहती है तो बस, दो जून रोटी की। रोज मिलने वाले झटके की परवाह कहां रहती है ?

गरीबों को झटके पर झटके लगते हैं।… Continue

Added by rajkumar sahu on September 29, 2011 at 11:54pm — No Comments

साक्षात्कार

कान्हा से मिलोगी सखी ?

हँसते -खेलते राधा से कहा मैंने..

सदियों से प्रतीक्षा में बँधी

राधा बोली-हाँ सखी..पर कैसे ?





चल न सखी,छोड़ न

इस धाम ,इस वृक्ष को

चल चलके देखे कान्हा धाम

वे जरुर मिलेंगे तुझको !





ख़ुशी से झूम राधा

चली मिलने शाम को

मेरा मन हुआ गर्वित,सोचा-चलो

यह जीवन आया कोई काम तो !





पर!यह तो थे कृष्ण

कान्हा तो हमे मिले नहीं

राधा क्या गिला करती

राधा को कृष्ण जाने नहीं… Continue

Added by Anwesha Anjushree on September 29, 2011 at 4:46pm — 2 Comments

इश्क है तो इश्क का इज़हार होना चाहिये....

 

ज़ख्म खाने को सदा तैयार होना चाहिये

तीर नज़रों का सदा उस पार होना चाहिये |


बन कहे ही जाने कितने हीर रांझे मिट गए ,
इश्क है तो इश्क का इज़हार होना चाहिये |


गर खुदा ना ही मिले तो भी मुझे परवा नहीं ,
साथ मेरे बस मेरा दिलदार होना चाहिये |


डूबती हैं कश्तियाँ साहिल पे भी आके कभी 
झूठ…
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Added by Veerendra Jain on September 29, 2011 at 1:45pm — 5 Comments

स्त्री और प्रकृति

प्रकृति और स्त्री

स्त्री और प्रकृति

कितना साम्य ?

दोनों में ही जीवन का प्रस्फुटन

दोनों ही जननी

नैसर्गिक वात्सल्यता का स्पंदन,

अन्तःस्तल की गहराइयों तक,

दोनों को रखता एक धरातल पर…

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Added by mohinichordia on September 29, 2011 at 10:35am — No Comments

Tarhee Mushaira-15

सर कल्म के वास्ते तैयार होना चाहिये।

इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिये।।

जश्न में शामिल होने वाले दोस्तों

रंजो-गमों मे भी हमवार होना चाहिये।।

घोडा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या।

बिन निस्बतों-लिहाज व्यापार होना चाहिये।।

अन्ना की तमन्ना के मुताबिक मुल्क से।

नौ दौग्यारह भ्रष्टाचार होना चाहिये।।

ईमानदारों से सजा दरबार होना चाहिये।

बेईमान बिल्कुल दरकिनार होना चाहिये।।

वजन से ज्यादा किसी पे ना भार होना चाहिये।

सीधा सरल व्यवहार होना… Continue

Added by nemichandpuniyachandan on September 28, 2011 at 11:08pm — 1 Comment

नेता जी से एक सवाल

तुमसे क्या उम्मीद करूँ, तुम दर्द बांटते रहते हो,

देश जले या लोग मरे, तुम माल काटते रहते हो!

  

तुम नेता हो, नवनिर्मित हो बस अपने सुख की सोचो तुम,…

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Added by Subhash Trehan on September 28, 2011 at 4:01pm — 3 Comments

खुश है जेल तिहाड़ का (अविनाश बागडे)

ओ बी ओ सदस्य श्री अविनाश बागडे जी की रचना

खुश है जेल तिहाड़ का,मन में है विश्वास.

गृह-मंत्री भी आयेंगे,चलकर उसके पास.



कमल कर रहा कोलाहल,कीचड में है हाथ.

मध्यावधि- चुनाव के रौशन है हालात.



शीर्ष मंत्रियों में मची ऐसी ,काटम -काट.

दस- जनपथ का देखिये .चिंता भरा ललाट.…



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Added by Admin on September 27, 2011 at 8:50pm — 7 Comments

कुछ शब्द ..

शब्दों में खोकर कहते तुम

वाह ! यह कविता अच्छी है

या हँसकर कहते..

ओह ! क्या है यह? क्या तू बच्ची है ?

 

 

मेरे शब्दों में अपनी छवि

देख तुम इतराते !

नासमझ बनने की कोशिश में

बार बार हार जाते !

 

 

इन…

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Added by Anwesha Anjushree on September 27, 2011 at 4:37pm — 7 Comments

व्यंग्य - ‘मौन-मोहन’ से मिन्नतें

हे ‘मौन-मोहन’, आपको सादर नमस्कार। आप इतने निराश मन से क्यों अपना राजनीतिक चक्र घुमा रहे हैं। जिस ताजगी के साथ आपने देश में नई बुलंदी को छू लिए और लोगों के दिल में समाए, आखिर अब ऐसा क्या हो गया, जो आप एकदम से थके-थके से नजर आ रहे हैं। जिस जनता-जनार्दन के सिर पर अपना ‘हाथ’ होने की दुहाई देकर आप सत्ता तक पहुंचे, उसी हाथ की आज क्यों जनता से दूरी बढ़ गई है। ’आम आदमी के साथ’ का जो नारा था, वो तो शुरू से ही साथ छोड़ गया है। निश्चित ही आपकी छवि, दबे-कुचले जनता के बीच अच्छी है, लेकिन आपके द्वारा उन्हीं… Continue

Added by rajkumar sahu on September 27, 2011 at 3:15pm — No Comments

मुँह छोटा पर बात बड़ी है।

पेट बडा है, भूख  बड़ी  है,

लोभ भरा है, सोच सड़ी है।

 …

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Added by Subhash Trehan on September 27, 2011 at 1:06pm — 5 Comments

एक हुए दोहा यमक: संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा यमक:

संजीव 'सलिल'

*

लिए विरासत गंग की, चलो नहायें गंग.

भंग न हो सपना 'सलिल', घोंटें-खायें भंग..

*

सुबह शुबह में फर्क है, सकल शकल में फर्क.

उच्चारण में फर्क से, होता तर्क कु-तर्क..

*

बुला कहा आ धार पर, तजा नहीं आधार.

निरा धार होकर हुआ, निराधार साधार..

*

ग्रहण किया आ भार तो, विहँस कहा आभार.

देय - अ-देय ग्रहण किया, तत्क्षण ही साभार..

*

नाप सके भू-चाल जो बना लिये हैं यंत्र.

नाप सके भूचाल जो, बना न पाये…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 27, 2011 at 7:30am — 1 Comment

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

नहीं आऊंगी ( धारावाहिक कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

---------------अंतिम अंक   --------------------

"कौन है?" मैंने हड़बड़ाकर पूछा .



"साहब ,दरवाजा खोलिए, गजब हो गया ." रामरतन के स्वर में घबड़ाहट थी. मैंने दौड़कर…
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Added by satish mapatpuri on September 26, 2011 at 10:00pm — 2 Comments

एक गीत: गरल पिया है... -- संजीव 'सलिल'

एक गीत:

गरल पिया है...

संजीव 'सलिल'

*

तुमने तो बस गरल पिया है...



तुम संतोष करे बैठे हो.

असंतोष को हमने पाला.

तुमने ज्यों का त्यों स्वीकारा.

हमने तम में दीपक बाला.

जैसा भी जब भी जो पाया

हमने जी भर उसे जिया है

तुमने तो बस गरल पिया है...



हम जो ठानें वही करेंगे.

जग का क्या है? हँसी उड़ाये.

चाहे हमको पत्थर मारे

या प्रशस्ति के स्वर गुंजाये.

कलियों की रक्षा करने को

हमने पत्थर किया हिया है…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 26, 2011 at 9:30pm — 1 Comment

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