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हरिगीतिका
(1)
मधु छंद सुनकर छंद गुनकर, ही हमें कुछ बोध है,
सब वर्ण-मात्रा गेयता हित, ही बने यह शोध है, 
अब छंद कहना है कठिन क्यों, मित्र क्या अवरोध है,
रसधार छंदों की बहा दें, यह मेरा अनुरोध है ||


(2)
यह आधुनिक परिवेश इसमें, हम सभी पर भार है,
यह भार भी भारी नहीं जब, संस्कृति आधार  है,
सुरभित सुमन सब है खिले अब, आपसे मनुहार है, 
निज नेह के दीपक जलायें, ज्योंति का त्यौहार है ||


(3)
सहना पड़े सुख दुःख कभी मत, भूलिए उस पाप को,
यह जिन्दगी है कीमती अब, छोडिये संताप को,
अभिमान को भी त्यागिये तब, मापिये निज ताप को,    
तब तो कसौटी पर कसें हम, आज अपने आप को||

--अम्बरीष श्रीवास्तव

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 19, 2011 at 12:28pm

धन्यवाद आदरणीया मोहिनी जी ! आपका हार्दिक आभार !

Comment by mohinichordia on October 6, 2011 at 8:08pm

हरीगीतिका  छंदों की ख़ूबसूरती बढ़ गई .सीधे- सादे शब्दों के प्रयोग से |

Comment by mohinichordia on October 6, 2011 at 8:05pm

अनुरोध,त्यौहार ,कसौटी तीनों शब्दों का बहुत ही खूबसूरत प्रयोग किया है आपने अम्बरीश श्रीवास्तव जी |बधाई 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 4:37pm

आदरणीया लता जी!  सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Comment by Lata R.Ojha on October 2, 2011 at 3:09pm

बहुत ही सुन्दर ..प्रेरक रचना :)

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 9:42am

स्वागत है भाई वीनस जी! तीनों छंदों को सराहने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद! :-))))

Comment by वीनस केसरी on October 2, 2011 at 1:54am

अब छंद कहना है कठिन क्यों, मित्र क्या अवरोध है,
रसधार छंदों की बहा दें, यह मेरा अनुरोध है ||

वाह, ऐसा सुमधुर, सुन्दर अनुरोध कौन टाल सकता है ...

तीनो छंद खूब पसंद आये
बधाई हो |

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 1:02am

स्वागत है भाई आशीष जी ! हरिगीतिका की सराहना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद ! भाई बागी जी का सुझाव अनुकरणीय है ! :-)

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 12:54am

धन्यवाद भाई बागी जी ! "भारतीय छंद विधान" ग्रुप का निर्माण अवश्य किया जाय ! नेक काम में देरी क्यों ? :-)

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2011 at 12:52am

स्वागत है भाई बृज भूषण जी !

कृपया ध्यान दे...

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