राजकुमार तोते को दबोच लाया और सबके सामने उसकी गर्दन मरोड़ दी... “तोते के साथ राक्षस भी मर गया” इस विश्वास के साथ प्रजा जय जयकार करती हुई सहर्ष अपने अपने कामों में लग गई।
उधर दरबार में ठहाकों का दौर तारीं था... हंसी के बीच एक कद्दावर, आत्मविश्वास भरी गंभीर आवाज़ गूंजी... “युवराज! लोगों को पता ही नहीं चल पाया कि हमने अपनी ‘जान’ तोते में से निकाल कर अन्यत्र छुपा दी है... प्रजा की प्रतिक्रिया से प्रतीत होता है कि आपकी युक्ति काम आ गई... राक्षस के मारे जाने के उत्साह और उत्सव के बीच…
Added by Sanjay Mishra 'Habib' on October 4, 2013 at 9:36am — 22 Comments
Added by Kapish Chandra Shrivastava on October 4, 2013 at 9:30am — 24 Comments
2122 1212 22
जुल्म को देख रहगुज़र चुप है
गाँव सारा नगर नगर चुप है
खामुशी चुप ज़ुबां ज़ुबां है चुप
दश्त चुप है शज़र शज़र चुप है
दोस्त चुप चाप दुश्मनी भी…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on October 4, 2013 at 8:00am — 39 Comments
1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2
चढा दी हसरतें सूली किसी ईनाम से पहले//
नमन है उन शहीदों को सदा आवाम से पहले//
बने आजाद परवाने कफ़न को सिर पे बांधा था
वतन पर जान देते थे किसी अंजाम से पहले //
भुला सकते न कुर्बानी वतन पर मर मिटे हैं जो
ज़माना सर झुकाएगा खुदा के नाम से पहले//
शहादत व्यर्थ उनकी यूँ नहीं अब तुम करा देना
नसीहत मानना उनकी किसी कुहराम से पहले//
वफ़ा कैसे निभानी सीखलो अपने वतन से तुम …
Added by Sarita Bhatia on October 3, 2013 at 8:00pm — 24 Comments
उठते बैठते बस एक ही ख्याल हुआ
क्यूँ जीना भी इस कदर मुहाल हुआ
लुटी आबरू तो चुप हैं सफ़ेद-पोश
ख़ामो ख्वाह की बातों पर बवाल हुआ
जलाता है रावण खुद अपना ही बुत
तमाशा ये देखो हर साल हुआ
जुबां…
ContinueAdded by Praveen Verma 'ViswaS' on October 3, 2013 at 6:43pm — 22 Comments
स्वच्छ गगन मे
सुवर्ण सी धूप
भोर की किरण ने
आ जगाया ।
अर्ध उन्मीलित नेत्र
उनींदा मानस
आलस्य पूरित
यह तन मन
पंछियों ने राग सुनाया ।
कामिनी सी कमनीय
सौंदर्य की प्रतिमा
नैसर्गिक छटा
फैली चहुं ओर
मुसकाते सुमन
झूमते तरुवर
नव जोश जगाया ।
हुआ प्रफुल्लित ये मन
तोड़ कर मंथर बंधन
मानो रोली कुमकुम
आ छिड़काया ।............. अन्नपूर्णा बाजपेई
अप्रकाशित…
ContinueAdded by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 4:59pm — 30 Comments
सेमीनार में “कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न” विषय पर अपना भाषण देकर जब प्रिंसीपल साहिब स्टेज से उतरे तो सभी ओर तालियों की गड़गड़ाहट व वाहवाही गूंज रही थी, सभी लोग बारी-बारी प्रिंसीपल साहिब को बधाईयां दे रहे थे। इसी क्रम में जब एक जूनियर अध्यापिका ने प्रिंसीपल साहिब को बधाई दी तो उन्हे लगा जैसे किसी ने सरे-बाजार उन्हे नंगा कर दिया हो।
- मौलिक व अप्रकाशित
Added by Ravi Prabhakar on October 3, 2013 at 4:00pm — 34 Comments
Added by Poonam Shukla on October 3, 2013 at 3:30pm — 16 Comments
"देखो सुशीला ये रूल में नहीं है मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम दुबारा शादी कर चुकी हो फिर कैसे अपने मरहूम पति की पेंशन ले सकती हो मैं अभी नया आया हूँ ,जैसे चलता आया है सब वैसे ही नहीं चलेगा; मैं इस मामले में बहुत सख्त हूँ" बड़े बाबू की फटकार सुनते ही सुशीला की आँखे भर आई हाथ जोड़ कर बोली "साहब मेरे दो बच्चों पर रहम खाइए आप किसी को कुछ मत कहिये बड़े साहब को पता चलेगा तो" !!! और वो फफक कर रो पड़ी।…
ContinueAdded by rajesh kumari on October 3, 2013 at 11:00am — 39 Comments
1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2 2
हुए रुखसत दिले -नादां की ही कुछ सिसकियाँ भी थी
खयालों में वही पहली नज़र की मस्तियाँ भी थीं
लहर तडपी थी हर इक याद पे मचला भी था साहिल
ज़माने की वही रंजिश में डूबी किश्तियाँ भी थीं
बिखरती वो घड़ी बीती न जाने कितनी मुश्किल से
दबी ही थी जो सीने में क़सक की बिजलियाँ भी थीं
कभी कहते थे वो भी उम्र भर यूँ साथ चलने को
चलीं हैं साथ जो अब तक वही गमगीनियाँ भी थीं
भुलाकर यूँ न जी पायेंगे गुजरे…
Added by sanju shabdita on October 3, 2013 at 10:26am — 23 Comments
कल राज्य में आम चुनाव के परिणाम का दिन था लोटन दास 'चम्मच छाप' पार्टी का पक्का समर्थक था, 'चम्मच छाप" बिल्ला लगाए, झंडा और गुलाल लिए वो और उसके साथी मतगणना स्थल पर सुबह से मौजूद थें, उसकी पार्टी को शुरूआती बढ़त मिलने लगी, लोटन दास और उसके साथी पूरे उमंग में नारे लगा-लगा कर गुलाल उड़ाते हुए नाच रहे थे ।
किन्तु यह क्या ! दोपहर बाद 'थाली छाप' पार्टी ने बढ़त बना ली और अंततः…
ContinueAdded by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 3, 2013 at 9:00am — 30 Comments
!!! काम अनंग समान हुए !!!
दुर्मिल सवैया ... आठ सगण यथा-
112 112 112 112 112 112 112 112
कलिकाल अकाल समाज ग्रसे, मन आकुल दीप पतंग हुए।
नित मानव दंश करे जग को, रति-काम समान दबंग हुए।।
घर बाहर ताक रहे वन में, जिय चोर उफान करे तन में।
अति हीन मलीन विचार धरे, निज मीत सुप्रीति छले छन में।।1
जग घोर अनर्थ अकारण ही, नित रारि-प्रलाप सहालग है।
कब? कौन? कथा सुविचार करे, अपलच्छन कर्म कुमारग है।।
जब धर्म सुनीति डिगे जग में, अवतार तभी जग…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 3, 2013 at 7:30am — 25 Comments
१.
टेढ़ी मचिया
टिमटिमाता दिया
टूटी खटिया.
२.
वर्षा की बूँदें
रिसती हुई छत
गीली है फर्श.
३.
छीजती आस
बिखरते सपने
टूटा साहस.
४.
छोटी सी जेब
बढती महंगाई
भूखा है पेट.
५.
बूढ़ा छप्पर
दरकती दीवार
खंडित द्वार.
६.
ठंडा है चूल्हा
अस्त होता सूरज
छाया कोहरा.
- बृजेश…
ContinueAdded by बृजेश नीरज on October 2, 2013 at 11:30pm — 26 Comments
!!! एक 'बापू फिर बुला मां शारदे !!!
बह्र-2122 2122 212
प्यार जीवन में बढ़ा मां शारदे।
दर्द मुफलिस का घटा मां शारदे।।
कंट के रस्ते भी फूलों से लगे,
राम का वनवास गा मां शारदे।
भील-शोषित का यहां उध्दार हो,
एक 'बापू' फिर बुला मां शारदे।
धर्म का रथ आस्मां में जा रहा,
गर्त में धरती उठा मां शारदे।
आततायी रोज बढ़ते जा रहे,
फिर शिवा-राणा बना मां शारदे।
लेखनी का रंग गहरा हो…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 2, 2013 at 10:30pm — 21 Comments
१
ना जाओ अभी कि मुलाक़ात अधूरी है !
तेरे – मेरे मिलन की हर बात अधूरी है !
जाने क्यों चल दिए तुम दामन छुडाकर!
शबनमी आँखों से लाज के मोती गिराकर !
पुरसुकूं हुस्न की एक झलक दिखाकर !
अभी नही बुझी आँखों की प्यास अधूरी है !
ना जाओ अभी कि मुलाक़ात अधूरी है !
तेरे – मेरे मिलन की हर बात अधूरी है !
२
काली बदलियों का आँखों में काजल लगाकर !
कांच के पैमाने में मय का जाम थमाकर !
रुखसारो पे…
ContinueAdded by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 8:07pm — 13 Comments
रूपसी
सुंदर, सकल काया, से सभी के ह्रदय में,
अनुकूल जोश भर, जाती है वो रूपसी,
नयन उचारें जब, मधु से भी मीठे बोल,
तब मदहोश कर, जाती है वो रूपसी,
मन है पवित्र ऐसे, गंगा का हो जल जैसे,…
ContinueAdded by Sushil.Joshi on October 2, 2013 at 8:00pm — 24 Comments
Added by Ravi Prakash on October 2, 2013 at 6:00pm — 26 Comments
बह्र : मुस्तफ्फैलुन मुस्तफ्फैलुन
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सच वो थोड़ा सा कहता है
बाकी सब अच्छा कहता है
दंगे ऐसे करवाता वो
काशी को मक्का कहता है
दौरे में जलते घर देखे
दफ़्तर में हुक्का कहता है
कर्मों को माया कहता वो
विधियों को पूजा कहता है
जबसे खून चखा है उसने
इंसाँ को मुर्गा कहता है
खेल रहा वो कीचड़ कीचड़
उसको ही चर्चा कहता है
चलता है जो खुद सर के बल
वो…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 2, 2013 at 3:23pm — 18 Comments
दीप बन अँधेरी राहो पे जलने लगा हूँ !
धवल चंद्रमा सा चमकने लगा हूँ !
चीर कर सीना निशा का ,
जग के तम को हरने लगा हूँ !
ना दे सहारे को अब कोई बैसाखी !
खुद के पैरो पे जो चलने लगा हूँ !
लडखडाहट का दौर गुजर चुका है !
अब तो मैं सँभलने लगा हूँ !
धो चुका हूँ आँचल के दाग सारे !
फूलों सा अब महकने लगा हूँ !
बंदिशों के पिंजरे तोड़ सारे !
मुक्त परिंदे सा चहकने लगा हूँ !
जला कर इर्ष्या और कपट को !
ज्वालामुखी सा…
ContinueAdded by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 2:30pm — 17 Comments
इन मौन चट्टानों के सामने खड़ा
यह सोचता हूँ ,
कितनी कठोर हैं ये /
जितनी कठोर लगती हैं
क्या उतनी ही?
या कहीं ज्यादा ?
क्या भेद सकेगा कोई इनको?
और फिर मैं देखता हूँ
आकाश की ओर /
बदली छाई है ,
धूप का कतरा नहीं है ।
और फिर क्या देखता हूँ
तोड़ कर प्रस्तर कवच को ,
मोतियों सा झर रहा है ,
दुधिया झरना ।
भूल जाता हूँ मैं
कि
कितने कठोर हैं ये पाषाण खंड ,
कि
मैं इन्हें भेद नहीं…
Added by ARVIND BHATNAGAR on October 2, 2013 at 12:30pm — 22 Comments
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