आदरणीय साथियो,
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रचना पटल पर उपस्थिति और विस्तृत समीक्षात्मक मार्गदर्शक टिप्पणी हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय तेजवीर सिंह जी। आपको पाठकीय निराशा हुई, इसका मुझे खेद है। भविष्य में ध्यान रखूंगा। लेकिन आपने वे शब्द या पंक्तियॉं इंगित नहीं कहीं, जहां आपको वैसी खामियॉं लगीं। मैंने रचना को पुनः पढ़ कर देखा है। मैं नहीं ढूंढ़ पा रहा। कृपया आप इंगित कर सहयोग कीजिए या अन्य सहभागी साथी या एडमिन महोदय सर जी। सादर निवेदन।
जिजीविषा
गंगाधर बाबू के रिटायर हुए कोई लंबा अरसा नहीं गुजरा था।यही दो -ढाई साल पहले सचिवालय की नौकरी से छुट्टी मिली थी।भरा -पूरा परिवार था।बीवी पुजारिन थी, बहुएं फैशनपरस्त।बेटे अपनी घर -गिरस्ती मग्न। पोते -पोतियां कुछ साथ निभाते।बाकी समय वे समाज -सेवा के नाम पर गली -मुहल्ले की सफाई पर लोगों से मशविरा करने या गलियों में श्वान -शौच करानेवालों से उलझने में निकालते।'सच कहां सिरमौर हुआ?' की उक्ति चरितार्थ होती।प्रायः उनके उलाहने आने लगे। कहां वे नौकरी काल में शिकायतें सुना करते? उनपर निर्णय सुनाते। विभाग की इथिक्स कमेटी के चेयरमैन की हैसियत थी उनकी।कहां आज वे खुद कठघरे में खड़े किए जाने लगे। नतीजतन, घर में ताने मिलने शुरू हो गए।बेटे,बहुओं की बातों को तो उन्होंने ताक पर रखी।पर,पत्नी की बेरुखी असह्य लगी।घर से निकल गए।
गंगा - यमुना सबके तटों पर रमे।जल में डुबकी लगाई।पर ठिकाना बनाया मुहल्ले के नामी वृद्धाश्रम को। वहीं सफाई,शुचिता,सेहत,नैतिकता जैसे उच्च भाववाले शब्दों को व्यवहार में उतारने की वकालत करते।खुद उनका आचरण वैसा ही था भी। सोचकर निकले थे कि अब किसी परिवार -जन से कोई लगाव न रखूंगा। पर,हर शाम काउंटर पर जाकर आगंतुकों की सूची जरूर जांचते।कहीं घर का कोई उन्हें तलाशते हुए आकर लौट न गया हो,यही सोचा करते।
"मौलिक एवं अप्रकाशित"
बढ़िया शीर्षक सहित बढ़िया रचना विषयांतर्गत। हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह जी। 'घर-गृहस्थी' शायद ग़लत टंकित हो गया है।
बहुत ही भावपूर्ण रचना। शृद्धा के मेले में अबोध की लीला और वृद्धजन की पीड़ा। मेले में अवसरवादी व्यापार। बीस रुपए की पानी की बोतल की मनमानी क़ीमत और आपाधापी में ढाबे वाले की लापरवाही। विशाल मेलों में यह सब होता है। शृद्धा और आस्था के मेले में गंगा मैया ही बच्चे की रक्षा कर परिवार तक पहुंचायेंगी। यह भी एक आस्था और विश्वास है। व्यवस्था अपनी जगह है और नागरिक दायित्व अपनी जगह और दुकानदारों और ढाबे वालों का सहयोगात्मक रवैया या उपेक्षित रवैया अपनी जगह। कुल मिलाकर विडम्बनाएं ही हैं। हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह जी इस मार्मिक रचना हेतु। विवरण कहानीनुमा हो गया सब कुछ बयाॅं करने से। शीर्षक कोई बढ़िया चुनना होगा। विवरण कहानीनुमा हो गया सब कुछ बयाॅं करने से
शीर्षक सुझाव: विकल्प/ अबोध का मेला/अबोध/ गंगा मैया खेवैया आदि
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