For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल..डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212   1212    1212    1212


निगाह  में उदासियां  छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती
लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

चमन में छा रही थीं बेशुमार बदहवासियां
न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

मिला न साथ दे सका जो चाहिए मिला नहीं
थी चार दिन की ज़िंदगानी दर्द बेहिसाब था

फ़ुज़ूल थे सवाल और चीखना फ़ुज़ूल 'ब्रज'
ख़मोशियाँ कमाल थी हरेक लाजबाब था

(मौलिक एवं अप्रकाशित) 
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 352

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 15, 2020 at 7:43pm

आदरणीय धामी जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित उत्साहबर्धक है...हार्दिक आभार आपका

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 16, 2019 at 7:53pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:18am

आपका उत्साहवर्धन अति महत्वपूर्ण है आदरणीय समर जी..आपके बताये अनुसार सुधार करता हूँ..कई बार की पेड ऐसी समस्याएं उत्पन्न कर देता है।लेकिन आपकी बारीक़ नज्र नहीं...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:14am

आदरणीय तेजवीर सिंह जी...आपके सुन्दर मनोहारी शब्दों के लिए हार्दिक अभिनदंन वंदन...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 10:14am

आदरणीय सुशील जी ग़ज़ल पे आपकी उपस्थित और हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया...

Comment by Samar kabeer on October 11, 2019 at 7:33pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'चमन में छा रही थी बेशुमार बदहवासियां'

इस मिसरे में 'थी' को "थीं" कर लें ।

'फ़िजूल थे सवाल और चीखना फ़िजूल 'ब्रज'

ख़मोशियाँ कमाल थी हरेक लाजबाब था'

इस शैर के ऊला में 'फ़िज़ूल' को "फ़ुज़ूल" कर लें,और सानी में 'थी' को "थीं" कर लें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on October 11, 2019 at 11:09am

हार्दिक बधाई आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी। वर्तमान हालात पर तंज करती बेहतरीन गज़ल। शानदार कटाक्ष।

चमन में छा रही थी बेशुमार बदहवासियां
न  टेसुओं  पे नूर था  न सुर्खरू  गुलाब था

Comment by Sushil Sarna on October 10, 2019 at 5:11pm

निगाह में उदासियां छुपा हुआ अज़ाब था

डरावनी सी रात थी बड़ा अजीब ख्वाब था

दिखी नहीं कली कहीं ख़ुशी से कोई झूमती

लबों लबों कराह और आँख आँख आब था

आदरणीय बृजेश जी बहुत ही खूबसूरत अहसासों को समेटे इस ग़ज़ल के दिल से बधाई।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Samar kabeer replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
""ओ बी ओ लाइव तरही मुशाइर:"अंक-124 को सफल बनाने के लिये सभी ग़ज़लकारों का हार्दिक आभार व…"
16 hours ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
" बहुत खूब आदरणीया  अंजलि जी .. अच्छी गज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद "
16 hours ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"उम्दा गज़ल की ढेरों मुबारकबाद अदरणीय सालिक गणवीर जी दूसरे शेर पर अच्छी इस्लाह हुयी ...."
16 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आ. अमीरुद्दीन अमीर साहब,अपेक्षा थी  कि आप अपनी रचना पर इंगित त्रुटियों को या defend करेंगे या…"
16 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"धन्यवाद आ. नादिर ख़ान साहब ..लेकिन अफ़सोस है कि चर्चा का रुख़ साहित्य केन्द्रित न हो कर कल्पनाओं को…"
16 hours ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आदरणीय नीलेश जी उम्दा गज़ल  के लिए आपको ढेरों मुबारकबाद, गुणी जनों की चर्चा से हम लोगों…"
16 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"मुहतरमा डिम्पल शर्मा जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया।…"
17 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आदरणीय दण्डपाणि नाहक़ जी आदाब ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया।…"
17 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आदरणीय निलेश जी ख़ाकसार की ग़ज़ल तक आने के लिये आभार। आपको भी आयोजन में सहभागिता हेतु बधाई। "
17 hours ago
नादिर ख़ान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"जी कोशिश करेंगे जल्दी आने की लेकिन ... और भी ग़म हैं .........   देर हो जाती है । सादर"
17 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आदरणीय नादिर ख़ान साहब आदाब बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
17 hours ago
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-124
"आ. नादिर खान साहब,अब बिना बात के नुक्ताचीनी तो कर नहीं सकता.. वैसे आप देखते ही होंगे कि मैं टोकने…"
17 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service