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अनरोई आँखें ...


बहुत रोईं
अनरोई आँखें
मन की गुफाओं में
अनचाहे गुनाहों में
शमा की शुआओं में
अंधेरों की बाहों में
बेशजर राहों में
किसी की दुआओं में
प्यासी निगाहों में
खामोश आहों में
सच
बहुत रोईं
ये कम्बख़्त
अनरोई आँखें

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on February 3, 2019 at 5:56pm

आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सृजन पर आपकी ऊर्जावान प्रशंसा का दिल से आभार। सर आपका कथन सत्य है पिछले कुछ दिनों से समयाभाव के कारण मेरी सक्रियता में कुछ कमी आई है। मैं प्रयास करूंगा कि आने वाले दिनों में अपनी सक्रियता बढ़ा सकूं। मैं इसके लिए आपसे और मंच से क्षमा चाहता हूँ। कृपया अपना स्नेह बनाये रखें। सादर ...

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on February 2, 2019 at 4:12pm

आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। बढिया कविता लिखी आपने। बधाई स्वीकार कीजिये। 

एक निवेदन है सरना जी,, थोड़ी सक्रियता बढ़ाएं और हमारी रचनाओँ पर भी आशीष दें तो कृपा होगी। सादर

Comment by Sushil Sarna on January 31, 2019 at 4:16pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का तहे दिल से शुक्रिया। सुझाव का दिल से आभार। अभी संशोधित करता हूँ सर।

Comment by Samar kabeer on January 28, 2019 at 6:08pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

'रोई' को "रोईं" कर लें ।

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