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ये जो है लड़की

उसकी जो आँखे

आँखों में सपना

सपने में घर

उसका अपना घर

जिसके बाहर

वो लिख सके

यह  मेरा घर है दुकान नहीं है

यह लड़की चेतन प्राणी है

कोई बिकाऊ सामान नहीं  है

..........................................................................

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by amita tiwari on October 18, 2018 at 1:47am

जनाब उस्मानी साहब 

गलती बताने के लिए दिल से आभारी हूँ .

(अभी ठीक करती हूँ )

शुक्रिया 

अमिता 

Comment by amita tiwari on October 18, 2018 at 1:45am

जनाब कबीर साहब ,जनाब शेख उस्मानी ,डा सिंह ,नीलम जी,तथा मुसाफिर जी 

आप सब की सराहना और स्नेह के प्रति आभारी हूँ .

आपने समय  दिया और बहुमूल्य सुझाव दिए ,इसके लिए  शुक्रिया 

साभार 

अमिता 

Comment by Samar kabeer on October 17, 2018 at 5:14pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on October 17, 2018 at 11:58am


आदरणीया  अमिता तिवारी जी, अच्छी रचना हुयी है, बधाई। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 17, 2018 at 10:19am

आ. अमिता जी, प्रयास के लिए बधाई । शेष गुणी जनों की सलाह का संज्ञान अवश्य लें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 17, 2018 at 6:10am

बहुत बढ़िया सारगर्भित रचना पर और समय देने पर सशक्त कन्या के सभी पक्ष लेकर बेहतरीन अतुकान्त या छंदयुक्त रचना कही जा सकती है। हार्दिक बधाई आदरणीया अमिता तिवारी साहिबा। (दूकान =दुकान)।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on October 16, 2018 at 2:30pm

आदरणीया अमिता जी कम से कम शब्दों मेंअपने हकीकत बया कर दी बधाई हो

कृपया ध्यान दे...

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