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Amita tiwari's Blog (56)

मातृ -महक

मातृ -महक
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
यह बात मुझे कभी समझ नहीं आती थी कि
मै समझदार जिम्मेदार क्यों नहीं हो पाती थी
सर्वदा सुरक्षित सर्वदा…
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Added by amita tiwari on May 13, 2020 at 3:00am — 2 Comments

शहर शर्म के चलते

कौन कहता  है कि

मन तभी  …

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Added by amita tiwari on April 30, 2020 at 3:00am — 5 Comments

कुछ भी निजी कदापि नहीं होता

कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मांसाहारी  होना 
या हमारा  शाकाहारी होना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता 
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा भरपेट से ज़्यादा खाना 
किसी की थाली आधी रह जाना 
स्वंय तक कभी सीमित नहीं होता   
कुछ भी निजी कदापि नहीं होता 
तुम्हारा मंज़िल दर  मंज़िल बढ़ाते जाना 
किसी की झुग्गी का…
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Added by amita tiwari on April 17, 2020 at 9:00am — 2 Comments

बस जुगनू भर को छोड़ देते

जिस मार्ग पे तुम अब चल निकले हो 

उस मार्ग से परिचय नहीं है  …

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Added by amita tiwari on April 13, 2020 at 2:00am — 1 Comment

धूप छाँह होने वाले

तमाम उम्र लगे रहे शहर शहर हो जाने में 
क्यों गांव गांव आज फिर होने लगी है ज़िंदगी …
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Added by amita tiwari on April 1, 2020 at 1:30am — 1 Comment

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

 
बहुत दिन बाद
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ होंगे
ये आजकल के दिन
ये जबरन बंद के दिन
 
जब पूरा परिवार
एक पूरे परिवार की तरह
पूरा -पूरा दिन साथ -साथ बैठ…
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Added by amita tiwari on March 20, 2020 at 7:00pm — 1 Comment

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

ये जो है लड़की

हैं उसकी जो आँखे

हैं उनमें जो सपने

जागे से सपने

भागे से सपने…

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Added by amita tiwari on March 4, 2020 at 1:07am — 2 Comments

किसी को कुछ नहीं होता

किसी को कुछ नहीं होता

तोता पंखी किरणों में

घिर कर

गिर कर

फिर से उठ कर

जो दिवाकर से दृष्ष्टि मिलाई

तो पलक को स्थिती समझ नहीं आयी

ऐसा ही होता है प्राय

मन ही खोता है प्राय

बाकी किसी को कुछ नहीं होता

किसी को भी



प्रचंड की आँख में झांकना

कोई दृष्टता है क्या

केवल मन उठता है

प्रश्न प्रश्न उठाता है

लावे की लावे से

मुलाकात…

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Added by amita tiwari on February 29, 2020 at 1:30am — 2 Comments

जायदाद के हकदार

अम्मा का जाना

जैसे पर्दों का हट जाना

एक- एक कर सारे के सारे तार- तार हो गए

जिगर के सब टुकड़े जायदाद के हकदार हो गए


छोटे छोटे पुर्जे तक बांटे गए

सारे कागज़ पत्र तक छांटे गए

जिगर के टुकड़े थे वो सारी जायदाद के हकदार हो गए
 
कुछ…
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Added by amita tiwari on February 15, 2020 at 7:30pm — 5 Comments

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द

ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द


चढ़ाये मैंने जो कुछ स्वर



बस केवल अंजुरी भर



पूरे युग के चौराहे पर



कुछ कानों को क्यों नागवार गुजरे



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द




वैसे सच है ये भी कि



उम्मीद ही नहीं थी इस बार



कि खाली जाएंगे सब वार



कि किसी को चुभेंगे ही नहीं



ये नहीं कहना चाहते मेरे शब्द





ये भी नहीं कहना चाहते मेरे शब्द



कि अब जो कुछ भी हैं…

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Added by amita tiwari on February 9, 2020 at 9:00am — 2 Comments

माँ के न हो जाने के बाद

माँ के होने और अचानक
 माँ के न होने जाने के बाद  
महज एक शब्द का अंतर नहीं हो जाता 
माँ का होना होता रहा होता था क्या 
एकदम समझ में आने लग जाता है 
माँ के न होने जाने के बाद 
 लगभग वैसे ही 
जैसे सूरज के होने में लगता ही नहीं
सूरज का होना कितनी बड़ी …
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Added by amita tiwari on January 29, 2020 at 1:30am — 1 Comment

पधार गए हो नए साल जो

पधार गए हो नए साल जो

खुश रहो औ ख़ुश रहने दो

आओ जीमो मौज मनाओ

जो जमा हुआ वो बहने दो

पथ भी रहें पंथी भी रहें

राहें भी दुश्वार न हों

सुरों मे गीत रहें न रहें…

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Added by amita tiwari on January 4, 2020 at 4:00am — 4 Comments

इतिहास अदालत होती है क्या

कौन कहता है कि इतिहास कोईअदालत होती है 

जिस में हार गयों की महज़ मुखाल्फत होती है 

और यह भी कि 

यह केवल विजयी का फलसफा लिखती है 

सफे पर सफा लिखती है 

इसलिए  मान लिया जाना चाहिए

कि जीत  यकीनन लाजिमी है 

कैसे भी हो  पर हो केवल विजय

लेकिन

शायद सही हो…

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Added by amita tiwari on August 23, 2019 at 1:00am — 4 Comments

सच बात तो यह

सुनो

वहम है तुमको

कि स्वर मिला स्वर में तुम्हारे.

मैं कृत -कृत हो  जाऊंगी…

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Added by amita tiwari on August 17, 2019 at 2:00am — No Comments

बूँद भर

बूँद भर 

 

आँख में ठहरा रहा

अश्रू सम बहरा रहा

विस्फरित हो तन गया

बूँद भर जल बन गया

कह  दिया न कहना था जो

न सहा वो  सहना था जो

था ही क्या जो कह गया

मन बेमन हो रह गया

 

एक ताला बनती  चाबी

प्रश्न- माला कितनी बांची

कैसे झटका  सह गया

मोती -मोती कह गया

 

कैसे -कैसे  मन ने टाला

मन ही ने लेकिन उछाला

झरना सा सब झर  गया

बूँद भर जल रह…

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Added by amita tiwari on August 1, 2019 at 1:30am — 3 Comments

आई थी सूचना गाँव में

बीते मास तेहरवीं तारीख़
तीन बजे अपरान्ह में
आई थी सूचना गाँव में
कि गाँव का होरी जो दिवाली पर आने को था
अब कभी…
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Added by amita tiwari on July 13, 2019 at 1:00am — 2 Comments

रजनीगन्धा मुस्कुराए न मुस्कुराए

कोई तो ऐसा दिन भी आए
कि रजनी हँसे रजनीगन्धा मुस्कुराए
बहुत दिन बीते बस यूँ ही रीते रीते
बहुत दिन बीते स्वयं ही जीते जीते
दे के मुल्क को बाकी दस महीने
अपने जो घर फ़ौजी सावन नहाए…
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Added by amita tiwari on July 7, 2019 at 2:30am — 3 Comments

पत्थरों पर गीत लिखे

कितने भले हो तुम 
कि तुमने 
पत्थरों पर गीत  लिखे

और पत्थर उछाल दिए 
 
इधर कितने भले हैं हम 
पत्थराई दृष्टि 
पत्थरों पर गीत पढ़े …
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Added by amita tiwari on March 23, 2019 at 12:30am — 1 Comment

चुनौती नए साल

      

चुनौती नए साल

 

नए साल

अब के जो आना

इतिहास के लिए कुछ पन्ने लेते आना…

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Added by amita tiwari on December 31, 2018 at 8:38pm — 4 Comments

वह धरती कब की छूट गयी

जहाँ सपने थे

लोग अपने थे

वह धरती कब की छूट गयी

भीड़ थी पर ठावँ थी

धूप थी संग छावं थी

वह धरती कब की छूट गयी

जनक थे जननी थी

बसेरा था रहनी थी

वह धरती कब की छूट गयी

जो छूट गये

जो रूठ गये

वही आस पास है

यह कैसे एहसास है ?

.

मौलिक व अप्रकाशित"

Added by amita tiwari on November 25, 2018 at 8:30pm — 3 Comments

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