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चश्मा उतार करके वफाओं को देखिए

221 2121 1221 212


पत्थर से चोट खाए निशानों को देखिए ।
बहती हुई ख़िलाफ़ हवाओं को देखिए ।।

आबाद हैं वो आज हवाला के माल पर ।
कश्मीर के गुलाम निज़ामों को देखिए ।।

टूटेगा ख्वाब आपका गज़वा ए हिन्द का ।
वक्ते क़ज़ा पे आप गुनाहों को देखिये ।।

गर देखने का शौक है अपने वतन को आज ।
शरहद पे ज़ह्र बोते इमामों को देखिए ।।

कुछ फायदे के वास्ते दहशत पनप रही ।
सत्ता में बैठे आप दलालों को देखिए ।।

मन्दिर न बन सके न वो मस्जिद ही बन सके ।
दूकान बन्द मत हो खजानों को देखिए ।।

मजहब नहीं बुरा है सियासत बुरी यहां ।
अमनो सुकूँ के खास इरादों को देखिए ।।

दर दर की खाक छान रहे नौजवान सब ।
हैं पेट के सवाल , सवालों को देखिए ।।

भरपूर टैक्स आप लगाते रहें मगर ।
थाली में क्या बचा है निवालों को देखिए ।।

मां भारती का ताज है मुस्लिम सपूत भी ।
चश्मा उतार कर के वफाओं को देखिए ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2018 at 3:52pm

लाजवाब....

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2018 at 10:44pm

खूब ग़ज़ल हुई आदरणीय त्रिपाठी जी..

Comment by Mohammed Arif on February 15, 2018 at 10:29am

कुछ फायदे के वास्ते दहशत पनप रही ।
सत्ता में बैठे आप दलालों को देखिए ।। वाह! वाह!!  बहुत ख़ूब ! बहुत ख़ूब !! बहुत ही उम्दा शे'र । सत्ता में बैठे कुछ हरामी देशवासियों को चैन से जीने नहीं दे रहे हैं ।

 उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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