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औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली
जिन्दगी डोर कभी इस हाथ में, तो कभी उस हाथ में
नही रहा कुछ अपने हाथ में
बचपन की डोर मॉ बाप के हाथ में
यौवन की डोर बंधी पति के हाथ में
इधर नाचती उधर नाचती
पहुची जब आखिरी पडाव में
जा पहुची बच्चों के हाथ में
औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली
सारी उमर बीत गई सोचते सोचते
क्या रहा अपने हाथ में
समझती रही सबके इशारे
करके हर अपने अरमान किनारे
औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली
सबको अपनाया सबको दुलराया
जब बेबस हुई तो दिखा न कोई सहारा
बनकर कठपुतली बीता जीवन सारा
औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली
मौलिक एवं अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2017 at 10:38am

आदरनीया  स्वीट पांडे जी , समाज मे नारी की स्थिति पर अच्छी कविता रची है , बधाइयाँ । शीर्षक सुधार लीजियेगा .. क पुतली मेरे खयाल से गलत है ।

Comment by Mohammed Arif on September 12, 2017 at 2:24pm
प्रिय स्वीट पांडे जी आदाब, टहली बार आपकी रचना से संवाद स्थापित कर रहा हूँ । अच्छी संभावना है आपमें में । जैसा आपने नारी का चित्रण किया आज की नारी वैसी है नहीं । वह अब कठपुतली नहीं रही । वह सक्षम है, सबल है । हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है । उसे कठपुतली कहना बेईमानी है । कुछ वर्तनीगत अशुद्धियाँ भी है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by पंकजोम " प्रेम " on September 12, 2017 at 9:56am
वाह दी ह्र्दयस्पर्शी कविता , मुबारक़बाद क़बूल करें
Comment by Mahendra Kumar on September 11, 2017 at 9:54pm

आ. Sweet Panday जी, स्त्रियों की हीन दशा को उजागर करती अच्छी कविता है. भारत की एक बहुप्रचलित प्राचीन पुस्तक में भी कुछ ऐसा ही उल्लेख है. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. वैसे मुझे लगता है कि यदि आप इस पंक्ति //औरत की जिन्दगी बन गई एक कठपुतली// को कुछ ऐसा कहतीं "औरत की ज़िन्दगी एक कठपुतली की तरह है" तो ज़्यादा बेहतर रहता. सादर.

Comment by Samar kabeer on September 11, 2017 at 5:54pm
अच्छी कविता है, बधाई स्वीकार करें ।

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