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कभी कभी तो लगता है,
जैसे लडकी होना एक गुनाह है,
हर कदम पर लोगों की प्यासी निगाह है,
कदम कदम पर लगती है बन्दिशे ,
हर कदम पर उठते है सवाल,
ऐसा लगता है ,
जैसे लडकी होना एक गुनाह है,
नही होता अधिकार लडकी को,
अपनी जिन्दगी के फैसले लेने का,
नही जी सकती अपनी जिन्दगी,
अपने बनाये खुद के उसूलो पर,
हर कदम पर बांध दी जाती है जजीर,
रिश्तों की मर्यादाओं की समाज के बने खोखले नियमों की,
सच में ऐसा लगता है ,
जैसे लडकी होना एक गुनाह है,
क्यो नहीं होती ये जजींरे,
लडको के कदमों पर,
क्यो होते है उन्हें इतने अधिकार,
चाहे वे बर्बाद कर दे किसी मासूम को,
बस मेरा यही एक सवाल है,
आखिर लडकी होना क्यो एक गुनाह है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 7:29pm

बहुत बढ़िया कविता है आ. स्वीट पाण्डेय जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Sweet Panday on September 25, 2017 at 7:26pm
सुरेन्द्र सर और कबीर सर आप दोनों लोगों को बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by Samar kabeer on September 25, 2017 at 5:41pm
मोहतरमा आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नाथ सोनांचली on September 25, 2017 at 4:31am
आद0 स्वीट पांडेय जी पहली बार इस मंच पर आपकी कोई रचना पढ़ रहा हूँ, बधाई इस सृजन पर। सादर

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