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पहरे

पहरे

बढ़ा लो पहरे और
फर्क क्या पड़ना है?
आतंक के माहौल में
आगे फिर भी बढ़ना है |
ठानी है जो तुमने करो
मैं अपना कर्तव्य निभाऊंगी
वक़्त आया तो
निडर होकर
देश पर जान वारूँगी।
दर्द इतना झेला है
अब न तुम मुझको डराओ
गोली बारूद की बिसात पर
मौत बुलाने से बाज आओ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 26, 2016 at 4:17pm

सुंदर भावों की  रचना के लिए हार्दिक  बधाई आ. कल्पना भट्ट जी | सादर 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 25, 2016 at 7:19am
धन्यवाद आदरणीय रामबली सर ।
Comment by रामबली गुप्ता on October 25, 2016 at 1:50am
वाह वाह सुंदर अतुकांत। बधाई स्वीकर करें।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 23, 2016 at 7:19pm
आदाब जनाब समर साहब । तेह दिल से शुक्रिया आपका ।
Comment by Samar kabeer on October 23, 2016 at 3:02pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिब आदाब,बहुत ही भावपूर्ण कविता लिखी आपने आज के माहौल पर,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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