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ग़ज़ल -- मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना ( दिनेश कुमार दानिश )

221--2122--221--2122

मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना
ता-उम्र फ़िक्रो-फ़न के ताज़ा गुलाब रखना

जाती है जान जाए लेकिन न कम हो इज़्ज़त
सहराओं के मुक़ाबिल क्या चश्मे आब रखना

देना हिसाब होगा हम सबको रोज़-ए-महशर
गठरी में तुम भी अपनी कुछ तो सवाब रखना

तहज़ीब का तक़ाज़ा कहता है औरतों को
शर्मो हया का हर पल रुख़ पर नक़ाब रखना

हर वक़्त भागना ही जीवन नहीं है प्यारे
साँसों के इस सफ़र में कुछ सब्रो-ताब रखना

उम्मीद पर टिकी है 'दानिश' हयात सारी
गर्दिश के दौर में भी, आँखों में ख़्वाब रखना

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on September 29, 2016 at 2:58pm

गर्दिश के दौर मे भी आँखों  में ख्वाब रखना, आशावादिता  का सुन्दर उदाहरण।बधाई ।

 

Comment by Sushil Sarna on September 28, 2016 at 2:05pm

तहज़ीब का तक़ाज़ा कहता है औरतों को
शर्मो हया का हर पल रुख़ पर नक़ाब रखना

वाह आदरणीय दिनेश जी क्या ख्याल पेश किया है आपने ... इस दिलकश ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई से।

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