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नया कोई सपना सजाकर तो देखो| -बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

अरकान -    122      122      122    122  

नया कोई सपना सजाकर तो देखो|

परायों को अपना बनाकर तो देखो

 

लगेगी ए दुनिया तुम्हें खूबसूरत,

ज़रा दिल से नफ़रत भुलाकर तो देखो|

 

सफलता मिलेगी तुम्हें भी यकीनन,

कदम अपने तुम भी बढाकर तो देखो|

 

बहू-बेटियाँ क्यों न पर्दा करेगी,

हया उनको तुम भी सिखाकर तो देखो|

 

करोगे जहां को भी सूरज –सा रोशन,

तुम अपने को पहले तपाकर तो देखो|

 

बनेंगे तुम्हारे सभी दोस्त अपने,

सबक दोस्ती का सिखाकर तो देखो|

 

ए राहे मुहब्बत है पुरखार यारो,

यहाँ फूल फिर भी सजाकर तो देखो|

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 20, 2015 at 5:48pm
बहुत सुंदर प्रस्तुति। कुछ अशआर तो बहुत ही गहराई लिए हुए हैं जनाब--
"बहू-बेटियाँ क्यों न पर्दा करेगी,
हया उनको तुम भी सिखाकर तो देखो|

करोगे जहां को भी सूरज –सा रोशन,
तुम अपने को पहले तपाकर तो देखो|"
--तहे दिल बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय बैजनाथ शर्मा 'मिंटू' जी ।
Comment by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 20, 2015 at 12:21am

आदरणीय महर्षि त्रिपाठी जी........ शुक्रिया 

Comment by maharshi tripathi on November 19, 2015 at 7:08pm

बहू-बेटियाँ क्यों न पर्दा करेगी,

हया उनको तुम भी सिखाकर तो देखो|

 

करोगे जहां को भी सूरज –सा रोशन,

तुम अपने को पहले तपाकर तो देखो|

 

बनेंगे तुम्हारे सभी दोस्त अपने,

सबक दोस्ती का सिखाकर तो देखो|

  बहुत उम्दा शेर आ.BAIJNATH SHARMA'MINTU' जी ,बधाई आपको |

 

Comment by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 19, 2015 at 6:31pm

आदरणीय रवि साहेब .......... सुझाव देने व हौसला बढ़ाने हेतु ...... तहेदिल से नमन व शुक्रिया | 

Comment by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 19, 2015 at 6:28pm

आदरणीया  राहिला साहिबा जी  ....... हौसला अफजाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया |

Comment by BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 19, 2015 at 6:26pm

आदरणीय सतविंदर जी .... शुक्रिया|

Comment by Ravi Shukla on November 19, 2015 at 2:48pm

आदरणीय बैजनाथ जी बहुत खूबसूरत प्रवाह वाली ग़ज़ल कही है आपने  बधाई स्‍वीकार करें

सफलता मिलेगी तुम्हें भी यकीनन,

कदम अपने तुम भी बढाकर तो देखो| कदम तो बढाना ही पड़ेगा  बहुत सुन्‍दर

कुछ टंकण त्रुटियों का पोस्‍ट करने से पहले सुधारा जा सकता था ।

इस ग़जल को पढ़ते हुए भारतीय छंद विधान के भुजंग प्रयात छंद का का शानदार प्रवाह आनंद दे रहा था । बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Rahila on November 19, 2015 at 11:41am
बेहद सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय बैजनाथ शर्मा जी,एक सकारात्मक संदेश देती इस रचना के लिये बहुत बधाई आपको । सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 18, 2015 at 11:07pm
करोगे जहांजहां भी सूरज सा रोशन
तुम अपने को पहले तपाकर तो देखो
बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय
बधाई

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