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“हैलो! क्या चल रहा है ?”

“सर!  अभी प्रमुख नेताओं का भाषण बाकी है, लगता है लम्बा चलेगा । भीड़ भी काफी है।“

"ओके!" 

“हैलो! , सर !  मंच के ठीक सामने कुछ दूरी पर एक पेड़ है, उस पर एक आदमी फांसी लगाने की कोशिश कर रहा है।“

“अरे! “सोच क्या रहे हो ? , कैमरा घुमाओ उसकी तरफ !, फोकस करो! , हिलना भी मत जबतक................!”

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 6, 2015 at 11:25am

दर्द और आज की वास्तविकता को जीवंत करती सुन्दर लघु कथा महिमा जी ....
जी कैमरे में तड़पन कैद हो जाए टी आर पी मिले धंधा चले बस ......जान जाए तो जाए ये तो खेल खिलौना है ..
भ्रमर ५

Comment by vijay nikore on May 4, 2015 at 2:54pm

लघु कथा अच्छी लगी, बधाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 4, 2015 at 10:38am

बहुत खूब, आदरणीया महिमा जी. कल परसों की एक सच्ची घटना को बड़ी खूबी के साथ आपने साझा किया है. हार्दिक बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 3, 2015 at 9:50am

सामयिक घटना को केन्द्रित कर  लिखी गई लघु कथा अपनी छाप छोड़ने में कामयाब हुई दिल से बधाई प्रिय महिमा श्री. 

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:19pm

पसंद करने केलिए आपका हृदय से आभार आ. धर्मेन्द्र जी

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:18pm

पसंद करने केलिए आपका हृदय से आभार आ. माला झा जी

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:17pm

पसंद करने केलिए आपका हृदय से आभार आ. नेहा जी

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:17pm

पसंद करने केलिए आपका हृदय से आभार आ. अर्चना जी

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:16pm

कथा को आपके मर्म तक पहुँची, लिखना सफल रहा .आ. सुनील जी, आपका हार्दिक आभार. सादर

Comment by MAHIMA SHREE on May 2, 2015 at 8:05pm

जी आ. गोपाल नारायण जी उसी घटना को आधार बनाया है आपका हार्दिक आभार. सादर

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