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जिंदगी रेत की मानिंद सरक जाती है
ये मेरी जीस्त हरेक गाम लरज जाती है
तू खफा है तो हुआ कर या रब
सामने मेरे फकत माँ ही काम आती है
ये हुस्न ये शबाब ये नामो शौकत
तूँ बता बाद में मरने के किधर जाती है
मेरी किस्मत है जैसे आंधियो में रेत के घर
जब चमकती है सरे राह बिखर जाती है
यूँ हुआ बेवफा मुझी से जहाँ
याद करता हूँ वफ़ा आँख बरस जाती है
अब मेरा दिल है मेरी जां है और बस मैं हूँ
उसको देखूं कभी ये रूह तरस जाती है
अब तो घर चल बहुत ही रात हुई अब तो मनुु
दूर होता हूँ तभी घर की भी याद आती है
मौलिक एवम अप्रकाशित
विजय कुमार "मनु"

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Comment by umesh katara on January 29, 2015 at 7:54pm

सुन्दर भाव

Comment by दिनेश कुमार on January 28, 2015 at 5:46pm
बहुत अच्छा काम किया भाई मिथिलेश जी।
Comment by vijay on January 28, 2015 at 10:00am
जी डॉ.साहिब मई अमल करूँगा
धन्यवाद
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2015 at 9:56am

aadarneey vijay jee is prayas ke liye hardik badhaaayee ..aadarneey mithilesh jee ke mashwire par amal karke aapko nischit hee faaida hoga //haardik shubhkaamnaaon ke sath saadar 

Comment by vijay on January 28, 2015 at 8:21am
आप सभी गुनीजनों का बेहद आभार जो आपने मेरा मार्ग दर्शन किया
एक बार फिरसे धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2015 at 12:47am

आदरणीय विजय कुमार 'मनु' जी आपकी रचना पढ़ी. भाव बहुत अच्छे है, तुक भी बढ़िया मिल रहा है. आपकी लेखनी संभावनाओं से भरी हुई है. बस सही दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है.अब आपकी रचना पर बात करें तो यह एक भावनाओं से परिपूर्ण रचना है जो कविता या गीत होने का आभास देती है किन्तु इसे ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता. ग़ज़ल में अशआर (बहुत से शेर) होते है, हर शेर दो मिसरों से बनता है. ग़ज़ल का पहला शेर मतला कहलाता है जिसके दोनों मिसरे हमकाफिया और एक ही रदीफ वाले होते है. जैसे आदरणीय खुर्शीद सर की Latest Blog में पोस्ट इस  ग़ज़ल को देखें -

उमंगों के चरागों को बुझाओ मत..... 

उजाले को अँधेरों से डराओ मत...... ये दोनों मिसरे या पंक्तिया मतला है जिसमे मत रदीफ़ और बुझाओ, डराओ का आओ काफिया है यहाँ दोनों मिसरे हमकाफिया है 

 

न फेंको तुम इधर कंकर तगाफ़ुल का          

परिंदे हसरतों के यूं उड़ाओ मत......  बाकी शेर में दूसरा मिसरा हमकाफिया होता है जैसे उडाओं मत का उड़ाओं काफिया व मत रदीफ़ 

 

ग़ज़ल हमेशा बहर में लिखी जाती है अर्थात मात्रा युग्म की आवृत्ति में जैसे इस ग़ज़ल की मात्रा युग्म 1222-1222-1222 है 

1222  / 1222  /    1222

उमंगों के/  चरागों को / बुझाओ मत

उजाले को /अँधेरों से /   डराओ मत

अब आपकी रचना पर बात करे तो इसमें काफिया और रदीफ़ शेर-दर-शेर बदल गए है और बहर का पालन भी नहीं हुआ है.

जैसे आपके रदीफ़ कहीं - जाती है तो कहीं आती है 

काफिया - सरक , लरज, काम, किधर बिखर बरस तरस और याद बनाए है जो बिलकुल अलग अलग है क्योकि इनमे कोई तुकान्त नहीं है. खैर शुरुआत है. यदि आप ग़ज़ल कहना चाहते है तो आप सही मंच पर आये है, यहाँ ग़ज़ल सहित अन्य काव्य विधाओं से सम्बंधित अनमोल खज़ाना भरा पड़ा है. आप ग़ज़ल सीखने के लिए ग़ज़ल की कक्षा और ग़ज़ल की बातें Join करे तो आपको बहुत कुछ मिलेगा. आपको लगेगा खज़ाना हाथ लग गया . सुलभ सन्दर्भ हेतु लिंक दी है 

http://www.openbooksonline.com/group/kaksha

http://www.openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn

Comment by somesh kumar on January 27, 2015 at 11:31pm

भाई अच्छा प्रयास है ,जिस विधा में लिख रहे हैं उसकी कुछ अच्छी रचनाओं को पढ़े ,नियमों को पढ़े ,जल्दी ही उम्दा साहित्य आपकी कलम से निकलेगा |

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 27, 2015 at 8:48pm
वाकई बहर और काफिया समझ नहीं पाया कृपया शंका समाधान करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 27, 2015 at 8:08pm

आदरणीय , बहर समझ नहीं पाया , बातें सुन्दर कहीं है , आपको बधाइयाँ ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 27, 2015 at 7:59pm
सुन्दर गजल भाई जी

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