अनबूझा मौसम
आसमानी बिजली
मूसलाधार बारिश
फिर सूरज की चमकती किरणें
डाल पर फूल का नव रूप धर आना
मौसम के बाद एक और मौसम ...
यह सब सिलसिला है न ?
पर किसी एक के चले जाने के बाद
यहाँ कहीं नए मौसम नहीं आए
एक मौसम लटक रहा है
उदासी का
डाल पर रुकी, लटक रही टूटी टहनी-सा
भय और शंका और आतंक का मौसम
भिगोए रहता है पलकों को
आधी रात
क्या नाम दूँ
टूटे विश्वास का धुँधलापन ओढ़े
कुहरीले अनबूझे इस मौसम को आज?
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-- विजय निकोर
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
सुन्दर रचना आदरणीय विजय निकोर सर ,बधाई !
क्या नाम दूँ
टूटे विश्वास का धुँधलापन ओढ़े
कुहरीले अनबूझे इस मौसम को आज?
वाह आदरणीय वाह … बहुत ही सुंदर और सटीक अंतर्व्यथा पर हृदय को कचोटता प्रश्न .... इस सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोर जी।
आदरणीय विजय निकोर सर लाजवाब हृदयस्पर्शी रचना है बहुत बहुत बधाई आपको
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