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इश्क कोई अनबुझी सी है पहेली

२१२२   २१२२   २१२२ 

ख्वाब जब दिल में हसीं पलने लगे है

अजनबी दो साथ में चलने लगे हैं 

इश्क कोई अनबुझी सी है पहेली 

जब हुआ सावन में तन जलने लगे हैं 

वक़्त के अंदाज बदले यूं समझ लो 

हुश्न आते पल्लू भी ढलने लगे हैं 

आप के शानो पे सर रखते कसम से 

लम्हे मेरी मौत के टलने लगे हैं 

जिस घड़ी ओंठो को गुल के चूम बैठा 

उस घड़ी से भौरों को खलने लगे हैं 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शकील समर on September 12, 2014 at 9:11am

आपका संशोधन दुरुस्त है आरदरणीय।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:53pm

गुदगुदाती हुई रचना! बधाई!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 10, 2014 at 8:00pm
आकर्षक, डॉo आशुतोष मिश्रा जी , बधाई.
Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 10, 2014 at 11:12am

आदरणीय गिरिराज भाई साब शकील जी की बातों पर ध्यान दे ते हुए कुछ संसोधन कर रहा हूँ ...फिर भी कोई गलती है तो बताने का कष्ट करें सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 10, 2014 at 11:11am

आदरणीय शकील जी ..इता दोष के मामले में अक्सर गलती होती है ...कुछ शेर हटा कर सुधार करने की कोशिस कर रहा हूँ यदि फिर भी कोए गलती हो तो बताने का कष्ट करें सादर 


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Comment by गिरिराज भंडारी on September 9, 2014 at 9:12pm

आदरणीय आशुतोष भाई , आ. शकील भाई की बात सही है , काफिया दोष पूर्ण है सुधार लीजिएगा | ग़ज़ल के प्रयास के लिए दिली बधाइयाँ |

Comment by शकील समर on September 9, 2014 at 4:51pm

आदरणीय डाक्टर साहब,
आपने मतले में रहने और डरने को काफिया चुना है। ये शब्द समतुकांत नहीं है, बल्कि समतुकांत होने का भ्रम पैदा कर रहे हैं। काफिया होने की एक शर्त ये भी है कि उसका हर्फे रवी समान हो। परंतु यहां ऐसा नहीं है। मूल शब्द 'डर' और 'रह' समतुकांत नहीं है। इस ईता का दोष कहते हैं। चूंकि मतले का काफिया ही दोषपूर्ण है, इसलिए आपको अपनी गजल पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।
हालांकि हुस्ने मतला में आपने काफिया सही चुना है, लेकिन शेष अशआर के काफिए दोषपूर्ण हैं।
सादर।

Comment by कल्पना रामानी on September 8, 2014 at 9:18pm

बहुत सुंदर गजल! बधाई आपको

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 8, 2014 at 1:35pm

आशू जी

 मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई -

प्रेम है कोई  पहेली  या समस्या i  

और जीवन भी भागीरथ की तपस्या 

स्नेह से सिचित अवनि आकाश साथी

नहीं आता प्यार सबको रास साथी i  

Comment by ram shiromani pathak on September 8, 2014 at 10:45am
वाह वाह आदरणीय आशुतोष जी बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल ।कुछ शेर तो बहुत ही बेहतरीन हुए है। हअदिक् बधाई आपको।।सादर

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