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आत्मकथन

जब जब बनाना चाहा
शब्दों को मिसरी
कुछ पूर्वाग्रह
घोल गये कड़ुवाहट
नहीं बना पाया मैं
खुद को मधुमक्खी
तब कैसे होते मधु
मेरे कहे गये शब्द
मैंने चाहा दिखना
बगुले सा धवल
तब कहां से आती
कोयल सी मधुरता
काक होकर भी
कहां निभा पाया
काक का धर्म
बस जमाये रखी
गिद्ध दृष्टि  
हर जीवित-मृत पर
समझ सकते हैं आप
कितना तुच्छ जीव
बनकर रह गया हूं मैं

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 30, 2014 at 7:24am

आदरणीय भाई सौरभ जी रचना पसंद आई . तगता है धीरे- धीरे सही रह पर आगे बढ़ रहा हूँ .उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2014 at 2:38am

बहुत खूब लक्ष्मण भाई.. .

एक सशक्त रचना के लिए बधाई..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 24, 2014 at 11:20am

आदरणीय शिज्जू भाई एवं प्राची बहन , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 23, 2014 at 9:34pm

हर मनुष्य के उजले श्यामल पक्ष दोनों ही होते हैं 

अंतर के श्यामल पक्षों पर खुद को टटोलती, उन्हें स्वीकारती प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 23, 2014 at 7:56am

बहुत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति है आदरणीय लक्ष्मणजी बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिये

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2014 at 7:51am

आदरणीय अरुण भाई रचना पसंद आई .तगता है धिरे धीरे सही रह पर आगे बढ़ रहा हूँ .आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2014 at 7:49am

आदरणीय विजय भाई उत्साहवर्धन के लिए आभार .

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 22, 2014 at 11:19am

आदरणीय लक्ष्मण जी रचना अच्छी लगी बधाई स्वीकारें.

Comment by vijay nikore on January 22, 2014 at 7:51am

आपकी रचना आपके अंतर्मन की गहन सोच को दर्शाती है। बधाई। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 22, 2014 at 6:33am

आदरणीय राहुल भाई, आत्मकतन की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद.

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