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सभी सम्माननीय पाठकवृंदों को नववर्ष कि शुभकामनाओं सहित

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1222 / 1221 / 1212 / 1222

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सुबह उसकी  महक लेकर , हवा मेला सजाती  है,
उदासी जुल्फ से उसकी  , चुरा के  शाम  लाती  है

वो जब  काँपती अंगुली , मेरी लट  में फिराती  है
यादे  बूढ़ी  माई की , वो फिर से  मन जगाती  है

पहुचता हूँ जो उस तक मैं , गुजरती साँझ बेला को
वो दिन भर की कथा मुझको, बिठा हद में सुनाती है

थका होता हूँ जिस दिन मैं, झिड़क देता उसे झट से
वो नादाँ तो झिड़क के भी , चकहती  कुलबुलाती है

समझ लेना ‘मुसाफिर’ मत , ये कहीं और संदर्भित
ये  मासूम   सनम   मेरा , मेरी  बच्ची  कहाती  है

**

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

**

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 9, 2014 at 8:41am

भाई अरुण जी आपका मसविरा सर आखों पर , अभी तो गजल कि दुनिया में जन्म भर लिया है . आप लोगों कि अंगुली पकड़ कर ही चलना आएगा . हार्दिक धन्यवाद .

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 3, 2014 at 5:16pm

भाई जी भावपक्ष तो दिल खुश कर गया लेकिन बह्र में गड़बड़ है उदाहरण के लिए देखिये.

1  2  2   2   1 2   2  2    1 2 1 2  1 2  2  2

सुबह उसकी  महक लेकर , हवा मेला सजाती  है,

1 2 2  2  1  2   2 1      1 2 1  2  1   2  2  2
उदासी जुल्फ से उसकी  , चुरा के  शाम  लाती  है . दोनों में फर्क है यदि लेकर को लेके करेंगे तो सही हो जाएगी. दूसरा देखिये

1   2    2  1 यहीं बडबडी हो गई १२२२ की जगह १२२१ है भाई जी.

वो जब  काँपती अंगुली , मेरी लट  में फिराती  है..

सतत प्रयासरत रहें अब मंजिल दूर नहीं.

Comment by Neeraj Nishchal on January 3, 2014 at 5:05pm

पहली बात आपकी ग़ज़ल तो बहुत ही और बहुत ही सुन्दर है
और उस पर ये पंक्ति

ये मासूम सनम मेरा , मेरी बच्ची कहाती है
क्या कहूं बहुत ही उम्दा

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 3, 2014 at 10:05am

वो जब  काँपती अंगुली , मेरी लट  में फिराती  है
यादे  बूढ़ी  माई की , वो फिर से  मन जगाती  है....यह शेर हृदयस्पर्शी हुआ

अति सुंदर गजल, बधाई स्वीकारें आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by MAHIMA SHREE on January 2, 2014 at 9:11pm

 

वो जब  काँपती अंगुली , मेरी लट  में फिराती  है
यादे  बूढ़ी  माई की , वो फिर से  मन जगाती  है...

 

थका होता हूँ जिस दिन मैं, झिड़क देता उसे झट से
वो नादाँ तो झिड़क के भी , चकहती  कुलबुलाती है

 बेहद प्यारी गज़ल आदरणीय धामी जी .. बहुत हार्दिक बधाईयाँ और शुभकामनायें आपकी बिटिया के लिए /सादर

 

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 2, 2014 at 9:10pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , बहुत सुन्दर गज़ल कही है भाई , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

कृपया ध्यान दे...

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