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जीवन का आधार.......

जीवन का आधार........

 

हर सांस

ज़िंदगी के लिए

मौत से लड़ती है

हर सांस

मौत की आगोश से

ज़िंदगी भर डरती है

अपनी संतुष्टि के लिए वो

अथक प्रयास करती है

मगर कुछ पाने की तृषा में

वो हर बार तड़पती है

तृषा और तृप्ति में सदा

इक दूरी बनी रहती है

विषाद और विलास में

हमेशा ठनी रहती है

ज़िंदगी प्रतिक्षण 

आगे बढ़ने को तत्पर रहती है

और उसमें जीने की ध्वनि

झंकृत होती रहती है

हर कदम पे लक्ष्य

बदलते रहते हैं

शह और मात के

इस खेल में जीत के

प्रयास चलते रहते हैं

हार जीने के प्रयास को

आगे ले जाती है

जीत जीवन के नए

लक्ष्य बनाती है

प्रतिक्षण जीने का संघर्ष

ही जीवन का आधार है

संघर्ष का विराम ही

जीवन पृष्ठ का उपसंहार है

 

सुशील सरना

 

''मौलिक एवं अप्रकाशित ''

Views: 769

Comment

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Comment by Sushil Sarna on November 26, 2013 at 12:34pm

aa.Dr.Gopal Narayan Shrivastav jee  rachna par aapkee aatmeey prashansa ka haardik aabhaar

Comment by Sushil Sarna on November 26, 2013 at 12:34pm

aa.Jitendr 'Geet' jee rachna par aapkee madhur prashansa ka haardik aabhaar

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on November 26, 2013 at 8:04am

 सुंदर भाव से जीवन के संघर्ष को परिभाषित करती रचना, बधाई स्वीकारें आदरणीय शुशील जी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 25, 2013 at 11:03pm

शरना जी

क्या बात है  i आपने बहुत अच्छी संजीदा कविता लिखी i

अंत तक दिशा बिलकुल सही i 

बधाई हो श्रीमन  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 25, 2013 at 9:47pm

बहुत बढ़िया आदरणीय सुशीलजी बहुत बहुत बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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