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Ram Awadh VIshwakarma's Blog – November 2013 Archive (2)

गजल - आप के चेहरे से डर दिखने लगा।

फाइलातुन  फाइलातुन  फाइलुन

.

धीरे- धीरे सब हुनर दिखने लगा।

उसमें कितना है जहर दिखने लगा।

आँख में कैसी खराबी आ गर्इ,

राहजन ही राहबर दिखने लगा।

लाख डींगे मारिये बेषक मगर,

आप के चेहरे से डर दिखने लगा।

जो दवायें दी थीं चारागर ने कल,

उन दवाओं का असर दिखने लगा।

जो कभी झुकता नहीं था दोस्तो

अब वही सर पाँव पर दिखने लगा।

जानवर तो जानवर हैं छोडि़ये,

आदमी भी जानवर दिखने…

Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on November 25, 2013 at 7:30pm — 15 Comments

गजल/समझते थे उगा सूरज सवेरा हो गया

मफार्इलुन मफार्इलुन मफार्इलुन फअल

समझते थे उगा सूरज सवेरा हो गया ,

यहाँ तो और भी गहरा अंधेरा हो गया।

जरा सा फर्क आया क्या दिलों में एक दिन ,

सगी बहनों में तेरा और मेरा हो गया।

कभी पहले से कोर्इ तय नहीं होती जगह ,

जहाँ चाहा वहीं संतो का डेरा हो गया।

कटेगी राम जाने किस तरह से जिन्दगी ,

मगर के साथ मछली का बसेरा हो गया।



फंसा कर जाल में मानेगा ही अब तो उसे ,

सुनहरी मछली पे मोहित मछेरा हो…

Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on November 6, 2013 at 8:30pm — 11 Comments

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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