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Gurpreet Singh
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Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सतविंद्र कुमार जी"
Saturday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आदरणीय ब्रजेँद्र नाथ जी .धन्यवाद ..आपको ग़ज़ल अच्छी लगी ..हमारा लिखना सफ़ल हो गया"
Saturday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी, यह ग़ज़ल अगर एक अच्छी ग़ज़ल हो पाई है तो केवल आपकी मेहरबानी से ....आपने इस ग़ज़ल में जुरुरी सुधार किए ....आपका तहेदिल से शुक्रिया ..ऐसे ही अपना आशीर्वाद हमारे सर पर बनाए रखिएगा सर जी"
Saturday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"वाह नीलेश सर जी ..क्या ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने ...सभी अशआर एक से बढ़कर एक ...आपकी ऐसी ही पढ़कर हमें भी कुछ अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"वाह वाह और वाह आदरणीय तस्डेक अहमद खान जी ..मुझे आप कि यह ग़ज़ल बेहद पसंद आई ..हरेक शेअर उम्दा हुआ है ..बहुत बहुत मुबारकबाद"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"कहीं पर्वत को स्वर्णिम कर लुभाता है हमें सूरज कहीं नदिया को सतरंगी दिखाता है हमें सूरज वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी ji..बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई है"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"वाह बहुत ही सुंदर , चहकती हुई कविता ..बहुत बहुत बधाई आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"वाह बहुत अच्छी रचना है आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय डा गोपाल नारायण जी"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"शुक्रिया जनाब तस्दीक अहमद खान जी"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ..यह जान कर बहुत तसल्ली हुई की आप को यह ग़ज़ल पसंद आई .....सच कहूँ तो जब मैने आज के आयोजन में आई दूसरी गजलें पढ़ी तो मुझे अपनी ग़ज़ल का एक ही विषय पर होने के बावजूद मुसलसल न होना इसकी कमजोरी लगा .. लेकिन अब आप के यह कहने से कि…"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"उफ़्फ़ सर जी ..बच्चे की जान लोगे क्या .. आप जैसे माहिर शायरों की संगत और मार्गदर्शन के कारण ही कुछ थोड़ा बहुत कह पाता हूँ ..आप को मेरी यह ग़ज़ल पसंद आई , यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है ...शुक्रिया"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"शुक्रिया आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी ग़ज़ल पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"शुक्रिया आदरणीया राजेश कुमारी जी .. -सब्ज़ खेतों में तेरी चाँदी ने सोना भर दिया,-... दरअसल इस मिसरे के कारण ही यह ग़ज़ल हुई ..यह obo live mahautsav में मेरी प्रथम रचना है ...जब इस बार का विषय देखा कि सूरज है तो यह मिसरा जो कि काफ़ी समय से दिमाग में था…"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आदरणीया प्रतिभा पांडे जी ..कोशिश पसंद करने के लिए आपका शुक्रिया"
Friday
Gurpreet Singh replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी, ग़ज़ल की तारीफ़ के लिए शुक्रिया"
Friday

Profile Information

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Male
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Patiala Punjab
Native Place
India
Profession
Govt Employee
About me
I love to write, but dont have an ustaad so dont know the rules. Thats why i am here

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ग़ज़ल --इस्लाह के लिए

      (122-122-122-12)

रहे हम तो नादां ये क्या कर चले

कि दौर ए जफ़ा में वफ़ा कर चले।

वो तूफ़ान के जैसे आ कर चले

मेरा आशियाना फ़ना कर चले।

रक़ीबों की तारीफ़ की इस क़दर

कि चहरा मेरा ज़र्द सा कर चले'

कहीं जाग जाएँ न इस ख़ौफ़ से

हम आँखों में सपने सुला कर चले

ज़मीं हमको बुज़दिल का ताना न दे

तो फिर हम ये नज़रें उठा कर चले।

तड़पते रहे अधजले कुछ हरूफ़

वो जब मेरे खत को जला कर…

Continue

Posted on August 16, 2017 at 4:30pm — 13 Comments

इस्लाह की गुज़ारिश के साथ एक ग़ज़ल पेश है (गुरप्रीत सिंह )

2122 -1212 -22

मुझ पे तू मेहरबां नहीं होता
मैं तेरा क़द्रदां नहीं होता।

बोलने वाले कब ये समझेंगे
चुप है जो बेज़ुबां नहीं होता।

कोई अरमान हम भी बोते. . .गर
मौसम-ए-दिल ख़िज़ाँ नहीं होता।

ख्वाहिशो सीने पे न दस्तक दो
अब मेरा दिल यहां नहीं होता।

जो बचाए किसी को कातिल से
वो सदा पासबाँ नहीं होता।

चाहे कितना उठे धुआँ ऊपर
वो कभी आसमाँ नहीं होता।
(मौलिक व् अप्रकाशित)

Posted on July 20, 2017 at 1:41pm — 14 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह)

2122 -1212 -22


आस दिल में दबी रही होगी
और फिर ख़्वाब बन गई होगी।

टूट जाए सभी का दिल या रब
दिलजले को बड़ी ख़ुशी होगी।

ज़ह्न हारा हुआ सा बैठा है
दिल से तक़रार हो गई होगी।

जिसकी खातिर लुटा दी जान उसने
चीज़ वो भी तो कीमती होगी।

जब मुड़ा तेरी ओर परवाना
शमअ बेइन्तहा जली होगी।

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Posted on July 11, 2017 at 1:26pm — 28 Comments

ग़ज़ल --इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह )

(2122-2122-2122-212)

पहले सूरज सा तपें खुद को ज़रा रोशन करें

फिर थमें मत फिर किसी को चाँद सा रोशन करें।

ये नहीं, कोई दिया बस इक दफ़ा रोशन करें

गर करें, बुझने पे उसको बारहा रोशन करें।

मेरी भी वो ही तमन्ना है जो सारे शह्र की

आप मेरे घर में आएं घर मेरा रोशन करें।

सामने है इक चराग़ और आप के हाथों में शमअ

आप किस उलझन में हैं जी?क्या हुआ? रोशन करें!

तीरगी के हैं नुमाइंदे सभी इस शह्र में

कौन है…

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Posted on May 23, 2017 at 10:04am — 22 Comments

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At 4:55pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय गुरप्रीत सिंह जी, आप नई चर्चा आरम्भ कर सकते हैं किन्तु ग़ज़ल के सम्बन्ध में "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" में पूर्व से ही कई चर्चाएँ चल रही है. जहाँ तक मुझे लगता है उन चर्चाओं में ग़ज़ल के लगभग सभी पहलुओं पर चर्चा हुई है और सतत हो रही है. अतः जिस विषय पर चर्चा पूर्व में ही आरम्भ हो चुकी है उसे आप निरंतर कर सकते है. वहीं अपने प्रश्न भी पूछ सकते हैं. गुनीजन स्वमेव ही उत्तर के साथ वहां उपस्थित हो जायेंगे. सादर 

At 10:42pm on August 21, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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"आदरणीय आशुतोष सर सादर आभार"
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"आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत आभार"
2 hours ago

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